
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के केंद्रीय निदेशक मंडल के सदस्य तथा वरिष्ठ सहकारिता नेता सतीश मराठे ने सहकारी बैंकों के निदेशक मंडलों में निदेशकों के कार्यकाल से जुड़े मुद्दे पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से हस्तक्षेप की मांग की है।
मराठे ने इस संबंध में अमित शाह को एक पत्र भेजा है। पत्र की प्रति शनिवार को इचलकरंजी में काजिस बैंक के नए मुख्यालय के उद्घाटन समारोह के दौरान महाराष्ट्र के सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने उन्हें सौंपी। पत्र में मराठे ने आरबीआई द्वारा संशोधित कार्यकाल प्रावधानों की व्याख्या को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इसके देशभर के सहकारी बैंकों पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम के संशोधित प्रावधानों की आरबीआई द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार, जिन निदेशकों ने लगातार 10 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है, वे सहकारी बैंकों के निदेशक मंडलों में बने रहने के लिए अयोग्य हो सकते हैं। उनके अनुसार इस निर्णय से सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के लगभग 65 से 70 प्रतिशत निदेशक प्रभावित हो सकते हैं।
मराठे ने चेतावनी दी कि बड़ी संख्या में अनुभवी निदेशकों के एक साथ पद छोड़ने से सहकारी बैंकों की प्रशासनिक व्यवस्था, संस्थागत निरंतरता और निर्णय प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे पूरे क्षेत्र में बार-बार चुनाव कराने की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है, जिससे जमाकर्ताओं और उधारकर्ताओं सहित सभी हितधारकों पर असर पड़ेगा।
उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए उपयुक्त अध्यादेश या अधिसूचना जारी कर प्रभावित निदेशकों को उनके वर्तमान निदेशक मंडल का कार्यकाल पूरा होने तक पद पर बने रहने की अनुमति दी जाए।
उल्लेखनीय है कि आरबीआई ने हाल ही में कुछ शहरी सहकारी बैंकों को भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया है कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 10ए(2ए)(i) तथा धारा 56 के तहत, जिन्हें बैंकिंग कानून (संशोधन) अधिनियम, 2025 द्वारा संशोधित किया गया है और जो 1 अगस्त 2025 से प्रभावी है, उसके अनुसार 10 वर्ष या उससे अधिक का लगातार कार्यकाल पूरा करने वाले निदेशक पद पर बने रहने के लिए पात्र नहीं होंगे।
इस मुद्दे के अलावा सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने अमित शाह को एक ज्ञापन भी सौंपा, जिसमें शहरी सहकारी बैंकों से संबंधित विभिन्न महत्वपूर्ण समस्याओं के समाधान की मांग की गई।
सहकारी बैंकिंग क्षेत्र ने प्रावधान (प्रोविजनिंग) एवं एक्सपोजर सीमा संबंधी मानदंडों में राहत, सहायता कोष की स्थापना, ऋण वसूली तंत्र को मजबूत बनाने, तरलता समायोजन सुविधा (एलएएफ) तक पहुंच प्रदान करने तथा दिवाला एवं ऋण वसूली प्रक्रियाओं में सुधार जैसे कदम उठाने की भी मांग की है।



