
नेशनल अर्बन कोऑपरेटिव फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनयूसीएफडीसी) के चेयरमैन ज्योतिंद्र मेहता ने संयुक्त राष्ट्र में आयोजित एक संगोष्ठी में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस संगोष्ठी में विभिन्न देशों के नीति-निर्माताओं, सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के नेताओं और वित्तीय विशेषज्ञों ने भाग लिया तथा समावेशी विकास और आर्थिक समानता को बढ़ावा देने में सहकारी वित्तीय संस्थानों की भूमिका पर चर्चा की।
सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी में मेहता ने इसे भारत के सहकारी बैंकिंग आंदोलन के लिए गर्व का क्षण बताया। पैनलिस्ट के रूप में अपने संबोधन के दौरान उन्होंने भारत के सहकारी बैंकिंग क्षेत्र की दो प्रमुख पहलों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष सराहना मिली।
उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सहकारी बैंकों में गैर-मताधिकार (नॉन-वोटिंग) शेयरों संबंधी चर्चा पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रस्ताव निवेशकों के लिए कारोबार योग्य तथा संभावित रूप से सूचीबद्ध शेयरों का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, जबकि सहकारिता के मूल सिद्धांत “एक सदस्य, एक वोट” को भी सुरक्षित रखेगा।
मेहता ने शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) के लिए स्थापित अम्ब्रेला संगठन की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह संस्था तकनीकी उन्नयन को गति देने के साथ-साथ साझा सेवाएं और वित्तीय अवसंरचना उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
मेहता ने कहा कि भारत का सहकारी वित्तीय मॉडल अब समावेशी विकास और समुदाय-आधारित वित्त व्यवस्था के एक प्रभावी उदाहरण के रूप में वैश्विक स्तर पर देखा जा रहा है।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सहकारी गठबंधन (आईसीए), इंटरनेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव बैंक्स (आईसीबीए) तथा अन्य वैश्विक संगठनों के प्रतिनिधियों के समक्ष भारत की उपलब्धियों को प्रस्तुत करने पर गर्व व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय सहकारी वित्तीय संस्थानों के प्रति बढ़ती वैश्विक रुचि इस बात का प्रमाण है कि वित्तीय समावेशन और सतत आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने में सहकारी बैंकिंग की भूमिका लगातार अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है।



