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बायोगैस: सुमुल हर साल बचा रहा 40,000 एलपीजी सिलेंडरों के बराबर ईंधन

सुमुल डेयरी ने ग्रामीण सतत विकास और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम करते हुए गुजरात के सूरत एवं आसपास के जिलों के गांवों में 6,543 बायोगैस संयंत्र स्थापित किए हैं। इस पहल के माध्यम से डेयरी अपशिष्ट को उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित कर हजारों ग्रामीण परिवारों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराया जा रहा है।

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ), नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय तथा गुजरात सरकार के सहयोग से संचालित इस कार्यक्रम से 6,500 से अधिक दुग्ध उत्पादक किसान और करीब 50,000 ग्रामीण सीधे लाभान्वित हो रहे हैं।

इस परियोजना के तहत प्रतिदिन लगभग 300 मीट्रिक टन गोबर का प्रसंस्करण कर बायोगैस तैयार की जा रही है, जिसका उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जा रहा है।

इसके परिणामस्वरूप हर वर्ष लगभग 40,000 एलपीजी सिलेंडरों के बराबर ईंधन की बचत हो रही है, जिससे ग्रामीण परिवारों के ऊर्जा खर्च में कमी आई है और गांवों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला है।

परियोजना से पर्यावरण संरक्षण को भी महत्वपूर्ण लाभ मिल रहा है। अधिकारियों के अनुसार, बायोगैस संयंत्रों के माध्यम से हर वर्ष लगभग 40,000 टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आ रही है। साथ ही, बायोगैस स्लरी से प्रतिदिन करीब 600 मीट्रिक टन जैविक खाद का उत्पादन हो रहा है, जिसका उपयोग किसान अपने खेतों में कर रहे हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ रही है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घट रही है।

सुमुल डेयरी के अनुसार, यह पहल डेयरी, नवीकरणीय ऊर्जा और जैविक खेती के सफल समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा पर आधारित यह मॉडल दर्शाता है कि सहकारी संस्थाएं न केवल ग्रामीण आजीविका को सशक्त बना सकती हैं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु संरक्षण और सतत विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

स्वच्छ ऊर्जा और प्राकृतिक खेती पर बढ़ते जोर के बीच सुमुल डेयरी का यह मॉडल देश की अन्य डेयरी सहकारी संस्थाओं के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण बनकर उभरा है।

यह पहल सहकारिता संस्थाओं की उस बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करती है, जिसके माध्यम से वे सामुदायिक भागीदारी के बल पर ग्रामीण समृद्धि, नवाचार और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा दे रही हैं।

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