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बायोगैस क्रांति: त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय और सुजुकी का करार

हरित ऊर्जा और सहकारिता आधारित ग्रामीण विकास को बड़ी मजबूती देते हुए इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट आनंद (इर्मा), त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय और सुजुकी आरएंडडी सेंटर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के बीच गुजरात में सतत ऊर्जा पहल और ग्रामीण सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए एक रणनीतिक परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

यह साझेदारी राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (यूएनआईडीओ) तथा राज्य की डेयरी सहकारी संस्थाओं के सहयोग से विकसित किए जा रहे आगामी बायोगैस संयंत्रों के सामाजिक एवं सामुदायिक प्रभाव को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई है।

इस पहल से गुजरात में उभरती सर्कुलर इकोनॉमी व्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में नए रोजगार और आजीविका के अवसर सृजित होने की उम्मीद है।

समझौते के तहत इर्मा और त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय ज्ञान सहयोगी की भूमिका निभाएंगे तथा बायोगैस परियोजनाओं से जुड़े सामाजिक प्रभाव आकलन, निगरानी एवं मूल्यांकन और जेंडर मेनस्ट्रीमिंग गतिविधियों का संचालन करेंगे। इन संस्थानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन का सीधा लाभ गांवों, डेयरी किसानों और सहकारी नेटवर्क से जुड़ी महिलाओं तक पहुंचे।

यह समझौता भारत के “विकसित भारत 2047” विजन तथा मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के दीर्घकालिक कार्बन न्यूट्रैलिटी लक्ष्यों के अनुरूप माना जा रहा है। सुजुकी गुजरात में डेयरी सहकारी संस्थाओं के साथ साझेदारी में अपनी बायोगैस पहलों का लगातार विस्तार कर रही है। राज्य के मजबूत दुग्ध सहकारी नेटवर्क और पशुधन संसाधनों को देखते हुए कंपनी इस क्षेत्र को हरित ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण मान रही है।

कंपनी पहले ही बनास डेयरी और एनडीडीबी जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसे संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) संयंत्र स्थापित कर चुकी है, जो पशु अपशिष्ट और कृषि अवशेषों को सीएनजी वाहनों के लिए स्वच्छ ईंधन में परिवर्तित करते हैं।

इस समझौते को शिक्षा जगत और उद्योग जगत के प्रमुख प्रतिनिधियों का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है तथा इसे सहकारिता आधारित जलवायु लचीलापन और समावेशी ग्रामीण विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी भविष्य में एक राष्ट्रीय मॉडल के रूप में उभर सकती है, जहां सहकारी संस्थाएं, शैक्षणिक संस्थान और उद्योग जगत मिलकर सतत विकास को गति देने के साथ-साथ जमीनी स्तर पर सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करेंगे।

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