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मराठे की अपील: सहकारी बैंक साक्षरता और दक्षता पर दें जोर

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के केंद्रीय बोर्ड के निदेशक सतीश मराठे ने शहरी सहकारी बैंकों को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि उन्हें तेजी से बदलते बैंकिंग परिदृश्य के अनुरूप खुद को ढालना होगा, अन्यथा वे रोजमर्रा के बैंकिंग कार्यों में अप्रासंगिक हो सकते हैं।

पुणे में आयोजित एक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए मराठे ने बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि निवेशक और उधारकर्ता अब अधिक जागरूक और चयनात्मक हो गए हैं। ऐसे माहौल में केवल विश्वसनीयता बनाए रखना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “बैंकों को प्रासंगिक बने रहने के लिए बैंकिंग साक्षरता को बढ़ाने की दिशा में सक्रिय रूप से काम करना होगा।”

मराठे ने एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि भारत की लगभग आधी आबादी अब भी औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से बाहर है, जो वित्तीय जागरूकता और समावेशन बढ़ाने की आवश्यकता को दर्शाता है।

उन्होंने आगे कहा कि निवेशकों और उधारकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन घटती ब्याज दरों के बीच ग्राहकों के लिए सूचित वित्तीय निर्णय लेना और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इस संदर्भ में उन्होंने ‘बैंकिंग साक्षरता’ पर आधारित नई पुस्तक के विमोचन का स्वागत करते हुए इसे जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक उपयोगी कदम बताया।

सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में सुशासन सुधारों पर बोलते हुए मराठे ने कहा कि निदेशकों के कार्यकाल को दो कार्यकाल (टर्म) तक सीमित करना एक प्रगतिशील कदम है, जिससे युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी और नया नेतृत्व सामने आएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार द्वारा जारी नियम सभी बैंकों पर बाध्यकारी हैं। साथ ही, आरबीआई ने शहरी सहकारी बैंकों की समस्याओं के समाधान के लिए एक समर्पित मंच भी स्थापित किया है।

चर्चा में डॉ. उदय जोशी ने कहा कि नियामकीय दृष्टिकोण बैंकों की संख्या कम करने की ओर संकेत करता है, जबकि नए लाइसेंस को लेकर स्पष्टता का अभाव है। उन्होंने बताया कि शुरुआती 2000 के दशक के बाद से सहकारी बैंकों को नए लाइसेंस जारी नहीं किए गए हैं, जिसके कारण क्रेडिट सोसायटियों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

बुलढाणा अर्बन के संस्थापक अध्यक्ष राधेश्याम चंदक ने जमा बढ़ाने के लिए सामाजिक बैंकिंग को मजबूत करने पर जोर दिया। वहीं, अनिल कवाडे ने सहकारी चुनावों के डिजिटलीकरण, लागत में कमी और ईवीएम आधारित प्रणाली के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयासों की जानकारी दी।

मिलिंद काले ने बताया कि अब तक 19 बैंकों का विलय कॉसमॉस बैंक में किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि ऐसे विलय नए क्षेत्रों में विस्तार के अवसर भी प्रदान करते हैं।

सत्र के समापन पर अजय ब्रह्मेचा ने कहा कि नए बैंकिंग लाइसेंस प्राप्त करना अब कठिन होता जा रहा है, लेकिन क्रेडिट सोसायटियों को बैंक में परिवर्तित करना एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।

इस अवसर पर ‘बैंकिंग साक्षरता’ विषय पर एक पुस्तक का विमोचन भी किया गया। लेखक गणेश निमकर ने पुस्तक के उद्देश्य पर प्रकाश डाला, जबकि प्रकाशक एवं ‘सहकार सुगंध’ के संपादक भालचंद्र कुलकर्णी ने अतिथियों का स्वागत किया।

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