
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में सुशासन को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए सोमवार को शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) और ग्रामीण सहकारी बैंकों (आरसीबी) के लिए अंतिम संशोधन निर्देश जारी कर दिए। नए नियमों के तहत किसी सहकारी बैंक के निदेशक मंडल में लगातार 10 वर्ष पूरे करने वाले निदेशक को उसी बैंक के बोर्ड में दोबारा नियुक्ति या चुनाव से पहले अनिवार्य रूप से तीन वर्ष का “कूलिंग-ऑफ” काल पूरा करना होगा।
भारतीय रिज़र्व बैंक ने इससे पहले 8 जनवरी 2026 को मसौदा संशोधन निर्देश जारी कर हितधारकों से सुझाव मांगे थे। प्राप्त सुझावों की समीक्षा के बाद केंद्रीय बैंक ने कुछ संशोधनों के साथ अंतिम निर्देश जारी कर दिए हैं, जो तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं।
आरबीआई ने कहा कि इन संशोधनों का उद्देश्य बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 10ए(2ए)(i) को प्रभावी ढंग से लागू करना है। केंद्रीय बैंक के अनुसार, कुछ मामलों में निदेशक अल्पकालिक इस्तीफा देकर पुनः चुनाव या पुनर्नियुक्ति के जरिए कानून की मंशा को दरकिनार करते हुए लंबे समय तक बोर्ड में बने रह रहे थे।
नए प्रावधानों के अनुसार, किसी सहकारी बैंक के बोर्ड में लगातार 10 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाला निदेशक तीन वर्ष की अनिवार्य कूलिंग-ऑफ अवधि पूरी किए बिना उसी बैंक के बोर्ड में वापस नहीं आ सकेगा। इस दौरान संबंधित व्यक्ति सदस्य या ग्राहक के अलावा बैंक से किसी अन्य क्षमता में जुड़ा नहीं रह सकेगा।
आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी निदेशक के कार्यकाल में तीन वर्ष से कम का अंतराल आता है, तो उसे निरंतर कार्यकाल का हिस्सा ही माना जाएगा। केवल तीन वर्ष या उससे अधिक का अंतराल ही कार्यकाल की गणना को रीसेट करेगा। हालांकि, ऐसे निदेशक पात्रता की शर्तें पूरी होने पर किसी अन्य बैंक के बोर्ड में शामिल हो सकते हैं।
संशोधित निर्देशों में यूसीबी और आरसीबी के लिए लगभग समान प्रावधान रखे गए हैं। यूसीबी निर्देश शहरी सहकारी बैंकों पर लागू होंगे, जबकि आरसीबी ढांचा राज्य सहकारी बैंकों और केंद्रीय सहकारी बैंकों को कवर करेगा। कूलिंग-ऑफ अवधि, कार्यकाल सीमा और प्रशासनिक प्रतिबंध दोनों श्रेणियों में समान रहेंगे।
इन संशोधनों की पृष्ठभूमि बैंकिंग कानून (संशोधन) अधिनियम, 2025 से जुड़ी है, जिसके तहत 1 अगस्त 2025 से सहकारी बैंकों के निदेशकों के अधिकतम निरंतर कार्यकाल को आठ वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष किया गया था। इससे पहले बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 के माध्यम से ये प्रावधान सहकारी बैंकों पर लागू किए गए थे।
सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि आरबीआई का यह कदम बोर्ड स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने, नेतृत्व में बदलाव सुनिश्चित करने और प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। नए नियमों के चलते लंबे समय से बोर्ड में बने कई निदेशकों को अब पद छोड़ना पड़ सकता है।



