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राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सहकारी समितियों की भूमिका महत्वपूर्ण

केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी कि वर्तमान में राष्ट्रीय और राज्य स्तर के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सहकारी क्षेत्र के योगदान का आकलन करने के लिए कोई अलग डेटाबेस नहीं रखा जाता है। इस कारण, जीडीपी में सहकारी क्षेत्र के योगदान की जानकारी प्रतिशत के रूप में उपलब्ध नहीं है।

हालाँकि, भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (एनसीयूआई) द्वारा 2018 में प्रकाशित भारतीय सहकारी आंदोलन पर सांख्यिकीय प्रोफ़ाइल-2018 के अनुसार, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों में सहकारी समितियों की अनुमानित हिस्सेदारी महत्त्वपूर्ण है। इसमें कृषि ऋण वितरण में 13.40%, किसान क्रेडिट कार्ड वितरण में 50.20%, उर्वरक वितरण में 35%, चीनी उत्पादन में 30.60%, तरल दूध विपणन में 84.17% और गेहूं व धान की खरीद में क्रमशः 13.30% और 20.40% हिस्सेदारी शामिल है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सहकारी समितियां उर्वरक विनिर्माण इकाइयों की स्थापित क्षमता में लगभग 25%, भंडारण क्षमता में 14.79%, स्पिंडलेज में 29.34% और प्रत्यक्ष रोजगार सृजन में 13.30% योगदान देती हैं। मछुआरों के संगठित क्षेत्र में यह हिस्सेदारी 20.05% है।

सरकारी योजनाओं में वित्तीय प्रवाह की निगरानी के लिए पीएफएमएस (पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम) एक वेब-आधारित केंद्रीकृत प्लेटफ़ॉर्म है, जिसे वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के लेखा महानियंत्रक (सीजीए) ने विकसित किया है। यह सभी स्तरों पर धनराशि के निर्गमन और खर्च की वास्तविक समय में रिपोर्टिंग सुनिश्चित करता है।

डीओई के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार, सभी केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं और उनकी कार्यान्वयन एजेंसियों का पीएफएमएस पर पंजीकरण और ईएटी मॉड्यूल का उपयोग अनिवार्य है। यह प्रणाली निधियों की पूरी ट्रैकिंग और समय पर वितरण सुनिश्चित करती है।

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