
अमित शाह ने बस्तर दौरे के दौरान सहकारिता आधारित विकास का व्यापक रोडमैप प्रस्तुत करते हुए कहा कि सहकारिता आंदोलन क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बदलने और आदिवासी समुदायों तक सीधे लाभ पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
जगदलपुर और बस्तर के अन्य क्षेत्रों में आयोजित कार्यक्रमों को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि वन आधारित लघु वनोपज को सहकारी ढांचे से जोड़ा जाएगा ताकि “उसका पूरा लाभ आदिवासी लोगों तक पहुंचे।”
उन्होंने कहा कि बस्तर के विशाल प्राकृतिक और कृषि संसाधनों का उपयोग स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी आजीविका सृजित करने में होना चाहिए, न कि बिचौलियों के मुनाफे के लिए।
केंद्रीय मंत्री ने क्षेत्र में प्राथमिक कृषि ऋण समितियों तथा गांव स्तर पर डेयरी व्यवस्थाओं की स्थापना के माध्यम से जमीनी सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने की योजना की भी घोषणा की।
अमित शाह ने कहा कि आदिवासी परिवारों को सहकारी डेयरी गतिविधियों से जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे वे सहकारी ढांचे के तहत पूरे देश में दूध का विपणन कर सकेंगे।
उन्होंने कहा कि बस्तर में सहकारिता आधारित यह पहल वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्र में व्यापक विकास रणनीति का हिस्सा है।
शाह ने बताया कि क्षेत्र में स्थापित लगभग 200 सुरक्षा शिविरों में से करीब 70 को अब “वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा” केंद्रों में परिवर्तित किया जाएगा, जहां दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों तक शासन, कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित की जाएगी।
उन्होंने कहा कि बस्तर में विकास की कमी नक्सली हिंसा का कारण नहीं, बल्कि उसका परिणाम थी, क्योंकि दशकों तक हिंसा के कारण बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और आर्थिक गतिविधियां आदिवासी क्षेत्रों तक नहीं पहुंच सकीं। अब सरकार भय और हिंसा की जगह विकास, सहकारिता और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना चाहती है।
अमित शाह ने सहकारिता विस्तार योजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “वोकल फॉर लोकल” पहल से भी जोड़ते हुए कहा कि बस्तर के आदिवासी उत्पादों, हस्तशिल्प और वन उपज को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने ‘बस्तर पंडुम’ जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके माध्यम से स्थानीय आदिवासी संस्कृति, खानपान, हस्तशिल्प और परंपराओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे आदिवासी समुदायों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मदद मिलेगी।
अधिकारियों का मानना है कि सहकारिता आधारित यह मॉडल वन उपज खरीद, डेयरी गतिविधियों और ग्रामीण मूल्य संवर्धन उद्योगों के जरिए आदिवासी परिवारों के लिए आय के नए अवसर पैदा कर सकता है।
केंद्र सरकार इस पहल को बस्तर की आदिवासी अर्थव्यवस्था को मुख्यधारा के विकास से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रही है। साथ ही क्षेत्र की पारंपरिक संस्कृति और पहचान को संरक्षित रखने पर भी जोर दिया जा रहा है।



