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कैंपको ने स्थापना दिवस पर मनाया पांच दशकों की शानदार सहकारी यात्रा का जश्न

कर्नाटक स्थित कैंपको ने 11 जुलाई 1973 को अपनी स्थापना के 53वें वर्ष के अवसर पर स्थापना दिवस मनाते हुए सुपारी, कोको और अन्य बागान फसलों के किसानों को सहकारिता के माध्यम से सशक्त बनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

सुपारी उत्पादकों को बाजार में भारी उतार-चढ़ाव और बिचौलियों के शोषण से बचाने के उद्देश्य से स्थापित कैंपको ने पिछले पांच दशकों में देश की अग्रणी कृषि सहकारी संस्थाओं में अपनी पहचान बनाई है। संस्था ने अपनी गतिविधियों का विस्तार सुपारी के अलावा कोको, रबर, काली मिर्च और नारियल जैसी बागान फसलों तक किया है तथा इनके लिए मजबूत मूल्य श्रृंखला विकसित की है।

वर्ष 1986 में पुत्तूर में शुरू की गई कैंपको की चॉकलेट निर्माण इकाई संस्था की मूल्य संवर्धन यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई। आज कैंपको की चॉकलेट देशभर में अपनी मजबूत पहचान बना चुकी है। इसके अलावा संस्था जैव उर्वरक, नारियल आधारित उत्पादों तथा अन्य कृषि आदानों का भी उत्पादन और विपणन कर रही है।

कर्नाटक और केरल में फैले व्यापक खरीद नेटवर्क के माध्यम से कैंपको आज करीब एक लाख किसान सदस्यों को सेवाएं प्रदान कर रही है। संस्था ग्रामीण आजीविका, रोजगार सृजन और सतत कृषि विकास को बढ़ावा देने वाली एक आदर्श सहकारी संस्था के रूप में स्थापित हो चुकी है।

स्थापना दिवस के अवसर पर कैंपको ने अपने सदस्यों के लिए एक मोबाइल एप्लिकेशन भी लॉन्च किया। इस एप के माध्यम से किसान खरीद, लेन-देन तथा सहकारी सेवाओं से जुड़ी जानकारी डिजिटल रूप से प्राप्त कर सकेंगे, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और सेवाओं तक उनकी पहुंच आसान होगी।

इस वर्ष का स्थापना दिवस इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि यह कैंपको के संस्थापक वाराणशी सुब्रह्मण्य भट्ट के जन्म शताब्दी वर्ष के साथ मनाया गया।

इस अवसर पर वक्ताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए किसानों के स्वामित्व वाली एक मजबूत सहकारी संस्था की स्थापना में उनके योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने बागान फसल उत्पादकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के साथ-साथ क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान की।

कैंपको ने नवाचार, मूल्य संवर्धन और सदस्य कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि वह सहकारिता आंदोलन को और सशक्त बनाने, किसानों की आय बढ़ाने तथा सतत कृषि एवं प्रसंस्करण गतिविधियों के माध्यम से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्य करती रहेगी।

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