
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए हर दशक ‘अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष’ मनाने की घोषणा की है। यह प्रस्ताव वर्ष 2012 और 2025 में मनाए गए अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्षों की सफलता पर आधारित है।
इसके माध्यम से सहकारी उद्यम मॉडल को समावेशी और सतत विकास के प्रमुख वाहक के रूप में वैश्विक स्तर पर नियमित रूप से रेखांकित किया जाएगा। महासभा के इस औपचारिक निर्णय ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सहकारी संस्थाएं केवल वैकल्पिक व्यावसायिक ढांचा नहीं हैं, बल्कि वैश्विक विकास एजेंडा की केंद्रीय भागीदार हैं।
प्रस्ताव में स्वीकार किया गया है कि सहकारी संस्थाएं अपने विविध स्वरूपों में सामुदायिक स्तर पर आर्थिक और सामाजिक विकास में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करती हैं। वे गरीबी उन्मूलन, भूख में कमी, लैंगिक समानता, वित्तीय समावेशन, सामाजिक एकता और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में प्रत्यक्ष योगदान देती हैं।
इस प्रस्ताव में सहकारी मॉडल को 17 सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति से भी जोड़ा गया है। इसमें उल्लेख किया गया है कि सहकारी संस्थाएं स्थानीय स्वामित्व, लोकतांत्रिक शासन और न्यायसंगत संपत्ति वितरण के माध्यम से आदिवासी समुदायों, ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य कमजोर वर्गों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करती हैं।
कृषि सहकारी संस्थाएं खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हैं, वित्तीय सहकारी संस्थाएं सुलभ और किफायती ऋण सुविधा प्रदान करती हैं, जबकि श्रमिक एवं उपभोक्ता सहकारी संस्थाएं साझा लाभ पर आधारित मजबूत और लचीली स्थानीय अर्थव्यवस्था का निर्माण करती हैं।
वर्ष 2025 में व्यापक रूप से मनाए गए अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष के बाद, नए प्रस्ताव में सरकारों से आग्रह किया गया है कि वे सहकारी संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए सहायक तंत्र को और मजबूत करें। इसमें सहकारी संस्थाओं की विशिष्ट पहचान को मान्यता देने वाले बेहतर कानूनी और नियामक ढांचे, पूंजी तक सुगम पहुंच, न्यायसंगत कर नीतियां तथा कृषि और वित्तीय सहकारिताओं को विशेष समर्थन देने की बात कही गई है।
प्रस्ताव में डिजिटल पहुंच का विस्तार, अनुसंधान एवं डेटा संग्रह को सुदृढ़ करना, जन-जागरूकता बढ़ाना और सहकारी नेतृत्व में लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने पर भी विशेष जोर दिया गया है।
इसके अतिरिक्त, महासभा ने सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, विशिष्ट एजेंसियों और सभी स्तरों पर सहकारी निकायों से प्रत्येक वर्ष जुलाई के पहले शनिवार को ‘अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस’ मनाते रहने का आह्वान किया है, जैसा कि प्रस्ताव 47/90 में घोषित किया गया था। वर्ष 2026 में सहकारिता दिवस 4 जुलाई को मनाया जाएगा, जिसकी थीम की घोषणा शीघ्र किए जाने की संभावना है।
वैश्विक सहकारिता आंदोलन के नेताओं ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे ऐतिहासिक मान्यता बताया है। इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायंस के अध्यक्ष डॉ. एरियल गुआर्को ने कहा कि यह घोषणा इस बात की सशक्त पुष्टि है कि पर्यावरणीय संकट, असमानता और वैश्विक अविश्वास के दौर में सहकारी मॉडल प्रभावी समाधान प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि सहकारी संस्थाएं यह सिद्ध करती हैं कि संपत्ति का सृजन और वितरण बिना किसी बहिष्कार के भी संभव है, साथ ही यह पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकजुटता को सुदृढ़ करता है।
इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायंस के महानिदेशक जेरोन डगलस ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र बहुत कम अवसरों पर किसी विशेष वर्ष की थीम को दोहराता है। ऐसे में हर दशक अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष मनाने का निर्णय इस आंदोलन की स्थायी प्रासंगिकता का असाधारण वैश्विक समर्थन है। उन्होंने इस पहल के लिए मंगोलिया सरकार की भी सराहना की, जिसने पूर्व के अंतरराष्ट्रीय वर्षों और नए प्रस्ताव की शुरुआत की थी।
संयुक्त राष्ट्र 1950 के दशक से सहकारिताओं को सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में मान्यता देता रहा है और 1992 से इस विषय पर नियमित द्विवार्षिक प्रस्ताव पारित करता आ रहा है। अप्रैल 2023 में महासभा ने सतत विकास के लिए सामाजिक और एकजुटता अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाला पहला प्रस्ताव भी पारित किया था।
इस नए प्रस्ताव के साथ, संयुक्त राष्ट्र ने सहकारिता आंदोलन को वैश्विक विकास की संरचना में और अधिक मजबूती से स्थापित कर दिया है। अब हर दशक विश्व समुदाय सहकारिता के उस मॉडल पर पुनर्विचार करेगा और अपनी प्रतिबद्धता दोहराएगा, जो लोगों, सहभागिता और साझा समृद्धि को केंद्र में रखता है।



