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पतन की पराकाष्ठा: विपुल चौधरी गिरफ्तार

गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) के पूर्व चेयरमैन विपुल चौधरी को पुलिस ने गिरफ्तार किया। विपुल की गिरफ्तारी 14.8 करोड़ रुपये के गबन में शामिल होने के कथित आरोपों के तहत की गई है। इस रकम से मेहसाणा स्थित दूधसागर डेयरी कोऑपरेटिव कंपनी के कर्मचारियों को बोनस दिया जाना था।

चौधरी डेयरी सहकारी को अपनी निजी जागीर समझते थे। उन्होंने अपने जीवन में कई गलतियां की, जिसकी वजह से उन्हें आज ऐसा दिन देखना पड़ा, उनके करीबियों ने कहा।

राज्य अपराध जांच विभाग (सीआईडी) के एक अधिकारी ने बताया कि विपुल को शनिवार को गांधीनगर से गिरफ्तार किया गया। विपुल और दूधसागर की चेयरमैन आशाबेन ठाकोर, उपाध्यक्ष मोढजीभाई पटेल और प्रबंध निदेशक एनजे बख्शी के खिलाफ गांधीनगर में सीआईडी के पुलिस थाने में मुकदमा दर्ज किया गया।

बता दें कि चौधरी शुरुआत से कांग्रेसी थे लेकिन जीसीएमएमएफ अध्यक्ष के पद को हड़पने के लिए उन्होंने पाला बदला और भाजपा का दामन थामा। लेकिन उनकी कार्यशैली से उनके दोस्त कम दुश्मन अधिक बन गए।

पाठकों को याद होगा कि गलत निर्णय लेने की वजह से 2013 में जीसीएमएमएफ के निदेशकों ने चौधरी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर उन्हें महासंघ के अध्यक्ष पद से हटा दिया था। उनके फैसलों में कुछ अनाजों की कीमत में वृद्धि को वापस लेना और महाराष्ट्र को बीज की आपूर्ति शामिल थी।

उनके फिजूल-खर्चो की खबरें तब भी सामने आयी जब वह दूधसागर डेयरी का नेतृत्व कर रहे थे और शरद पवार से निकटता होने के कारण उन्होंने 22 करोड़ रुपये का पशु चारा पवार को भेजा और बदले में एक भी पैसा वसूल नहीं किया। इससे डेयरी को नुकसान हुआ और मार्च 2015 में, कथित अनियमितताओं के आरोप में उन्हें दूधसागर डेयरी के अध्यक्ष पद से बर्खास्त किया गया।

एक ट्रिब्यूनल ने 2018 में, चौधरी को दूधसागर डेयरी के 22.5 करोड़ रुपये का 40 प्रतिशत अर्थात् 9 करोड़ रुपये अक्टूबर, 2019 तक जमा करने का निर्देश दिया था।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, “इस राशि को जमा करने के लिए, चौधरी और अन्य आरोपियों ने कथित रूप से एक साजिश रची और दुधसागर के 1,932 कर्मचारियों के लिए बोनस के रूप में निर्धारित 14.8 करोड़ रुपये निकालने के लिए अपने वित्तीय अधिकार का दुरुपयोग करते हुए 30 अधिकारियों को शामिल किया”।

इससे पहले, राज्य सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार ने उन्हें किसी भी सहकारी समिति के चुनाव लड़ने या ऐसी किसी समिति में किसी भी पद को संभालने से छह साल की अवधि के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। इस आदेश को बाद में शीर्ष अदालत ने चार साल के प्रतिबंध में संशोधित कर दिया था।

स्मरणीय है कि भले ही उनको चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था, लेकिन दूधसागर में उनके दबदबे के कारण उनके नेतृत्व वाले पैनल ने डेयरी की सोलह सीटों में से तेरह सीटें जीतीं।

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