
वर्किंग वुमेन्स फोरम और इंडियन कोऑपरेटिव नेटवर्क फॉर विमेन की अध्यक्ष डॉ. नंदिनी आजाद ने कहा है कि जमीनी स्तर पर महिलाओं की सहकारी संस्थाएं आर्थिक असुरक्षा को स्वामित्व, नेतृत्व और सामाजिक बदलाव में बदलने का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं।
आईआईटी मद्रास में हाल ही में आयोजित आर्ट्रिब्यूट 2026 के थीम लॉन्च “शेड्स ऑफ हर – ट्रिब्यूट टू विमेन” को संबोधित करते हुए आजाद ने कहा कि तकनीकी और आर्थिक प्रगति तभी सार्थक होगी, जब वह महिलाओं को आर्थिक अवसरों के साथ निर्णय लेने की क्षमता और स्वायत्तता भी प्रदान करे। उन्होंने विज्ञान, नवाचार और महिला सशक्तिकरण को एक मंच पर लाने के लिए आईआईटी मद्रास और शास्त्र टीम की सराहना की।
अपने अनुभव साझा करते हुए आजाद ने कहा कि प्रगतिशील पारिवारिक वातावरण और शिक्षित महिलाओं के प्रभाव ने उनके भीतर यह विश्वास पैदा किया कि महिलाओं के लिए कोई पूर्व निर्धारित सीमाएं नहीं होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि सिरैक्यूज़ यूनिवर्सिटी से पीएचडी उनके लिए केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि इससे उनकी बेटी को यह संदेश मिला कि विवाह किसी महिला की पेशेवर आकांक्षाओं का अंत नहीं है।
आजाद ने कहा कि भारत में गरीब महिला श्रमिकों में 90 प्रतिशत से अधिक अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती हैं, जहां उन्हें पर्याप्त सौदेबाजी शक्ति, निवेश क्षमता और संस्थागत सहयोग नहीं मिल पाता। वर्किंग वुमेन्स फोरम ने 1978 और इंडियन कोऑपरेटिव नेटवर्क फॉर विमेन ने 1981 से गरीब महिलाओं के साथ काम करना शुरू किया। आज इन संगठनों से तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 6 लाख से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं, जो खेती, मछली पालन, फेरी-विक्रय, पोल्ट्री, बुनाई और खाद्य व्यवसाय सहित 262 प्रकार के कार्यों में सक्रिय हैं।
आजाद के अनुसार, संगठनों ने लगभग 500 करोड़ रुपये के छोटे ऋण वितरित किए हैं। ऋण के साथ महिलाओं को लैंगिक जागरूकता, नेतृत्व प्रशिक्षण, उद्यम विविधीकरण और परिसंपत्ति निर्माण का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
उन्होंने पद्मावती का उदाहरण देते हुए बताया कि अनाज के रूप में मजदूरी पाने वाली एक महिला छोटे ऋणों के जरिए बैल, कृषि उपकरण और जमीन खरीदने में सक्षम हुई और बाद में फसल तथा विपणन संबंधी निर्णय लेने लगी। आज इंडियन कोऑपरेटिव नेटवर्क फॉर विमेन की 38 प्रतिशत महिला सदस्यों के नाम भूमि का स्वामित्व है।
आजाद ने इस प्रक्रिया को “एक्यूम्यूलेशन एट बेस” मॉडल बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य महिलाओं को वित्तीय सहायता से आगे बढ़ाकर परिसंपत्ति स्वामित्व और नेतृत्व तक पहुंचाना है। उन्होंने महामारी के दौरान 65 मुख्य कार्यकारी अधिकारियों, शाखा प्रबंधकों और महिला नेताओं को डिजिटल लेनदेन, एनईएफटी और यूपीआई का प्रशिक्षण दिए जाने का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि गरीब महिलाओं को वित्त, प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर वे संस्थाओं का प्रभावी संचालन कर सकती हैं।



