एनसीसीटी: क्या एनसीयूआई मंत्रालय के आदेश को मात दे पाएगी?

एनसीसीटी को एनसीयूआई से अलग करने का मामला कोर्ट में चल रहा है और सुनवाई के लिए अगली तारीख 26 अप्रैल की मिली है। विशेषज्ञों की एक टीम ने एनसीयूआई को इस मामले से निजात दिलाने के लिए कमर कस ली है। उनका कहना है कि मंत्रालय का आदेश अपनी कमियों के चलते न्यायिक जांच में टिक नहीं पाएगा।

विशेषज्ञों से बात करते हुए भारतीय सहकारिता ने उन लोगों के तर्कों को समझने की कोशिश की है। हम आपके सामने उन बातों को रख रहें हैं। विशेषज्ञों को भरोसा है कि इन तथ्यों के बल पर मंत्रालय के आदेश को गलत ठहराने में सफल होंगे।

एनसीसीटी को शीर्ष सहकारी संस्था एनसीयूआई द्वारा उप-नियम 16 ए के तहत बनाया गया था। एनसीसीटी के निर्माण का मुद्दा सबसे पहले गवर्निंग काउंसिल द्वारा स्वीकार किया गया था और बाद में वार्षिक जनरल असेंबली द्वारा पारित किया गया। बाद में, इस संशोधन को केंद्रीय रजिस्ट्रार को स्वीकृति के लिए भेजा गया था जिन्होंने इस पर अपनी मोहर लगाई थी। यानि कि एनसीसीटी का गठन पूर्णरूपेण नियमों का पालन करते हुए हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार मंत्रालय के पास एनसीसीटी को एनसीयूआई से अलग करने का कोई अधिकार नहीं है। मंत्रालय का आदेश कानूनी रूप से गैर लोकतांत्रिक माना जाएगा।

दूसरा तर्क जो मंत्रालय के आदेश के खिलाफ जा सकता है- वो है आदेश की प्रक्रिया जिसे मंत्रालय ने ढंग से नहीं निभाया। विशेषज्ञों का मानना है कि मंत्रालय को सबसे पहले सर्वोच्च सहकारी संस्था को कारण बताओ नोटिस जारी करना चाहिए था जो कि इसने नहीं किया। इस मामले में मंत्रालय को अदालत से फटकार मिलने की संभावना बताई जाती है।

विशेषज्ञों ने इस मुद्दे पर तीसरा तर्क देते हुए बताया कि “ऐसे अादेश आमतौर पर तब दिए जाते हैं जब सार्वजनिक हित को कोई नुकसान पहुंचा हो या फिर जनता के हितों के साथ समझौता किया गया हो। इस मामले में ऐसा कुछ भी नही हुआ है- न तो वित्तीय अनियमितता या फिर गैर-प्रबंधन का कोई भी आरोप एनसीयूआई पर लगाया गया है।

मंत्रालय द्वारा जारी पत्र में कई और कमजोर तथ्य है जो एनसीयूआई की जीत को आसान बना सकते हैं। पत्र में कहा गया है कि एनसीसीटी सचिव का पद अध्यक्ष और डीजी दोनों से छोटा होता है और इसलिए वे कारगर नहीें है जबकि एनसीसीटी का क्रियाकलाप पूर्ण रूप से एनसीसीटी समिति चलाती है।

एनसीसीटी का महत्वपूर्ण अंश एनसीसीटी समिति है जिसे सीधे मंत्रालय द्वारा नियुक्त किया जाता है। इसमें एनसीयूआई के अध्यक्ष और डीजी शामिल हैं लेकिन अधिकांश सदस्यों को मंत्रालय द्वारा नियुक्त किया जाता है। इससे पहले मंत्रालय समिति के सदस्यों की नियुक्ति के लिए एनसीयूआई से सलाह लेती थी लेकिन इस बार मंत्रालय ने एनसीयूआई की सलाह नहीं ली।

जानकार पूछते हैं कि किसी भी वीटो शक्ति के बिना, अध्यक्ष समिति में अपनी शर्तों को किस प्रकार मनवा सकता है? सब जानते हैं कि एनसीसीटी बहुमत के आधार पर चलती है। विशेषज्ञों का तर्क है कि सुनवाई शुरू होने पर मंत्रालय के पत्र में इस तरह की आधारहीन बातों से एनसीयूआई के वकीलों को काफी मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों ने यह भी पाया कि एनसीसीटी के बही-खातों को एनसीयूआई में जमा नहीं कराया जाता है और उन्हें सीधे मंत्रालय भेजा जाता है। “वार्षिक खातों को एनसीयूआई को नहीं दिखाया जाता हैं”, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि एनसीयूआई ने एनसीसीटी को हानि पहुंचाई है।

विशेषज्ञों ने मंत्रालय के पत्र में एक और तर्क को खारिज किया जिसमें मंत्रालय ने एनसीयूआई को सरकारी ऑडिट के दायरे से बाहर एक निजी निकाय होने की बात कही है। वकीलों ने पाया है कि न सिर्फ इसके खातों की जांच सरकार द्वारा की जाती है बल्कि सीएजी भी हर 2-3 साल में इसकी समीक्षा करती है। एनसीयूआई के वार्षिक खाते को संसद में पेश किया जाता है और कोर्ट में यह तर्क मंत्रालय के आदेश को गलत साबित करेगा, जानकारों ने कहा।

आदेश में एक जगह कहा गया है कि एनसीसीटी के अध्यक्ष भ्रष्टाचार के लिए जवाबदेह होने चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मंत्रालय के बाबूओं की छल नीति है और वे अदालत में इसे साबित करने में असफल रहेंगे। "यह एक सामान्य बात है कि यदि कोई भी व्यक्ति भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहराया जाता है तो उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और जांच करने से मंत्रालय को कौन रोक रहा है" , विशेषज्ञों ने पूछा।

“इस मामले की सच्चाई यह है कि मंत्रालय के बाबूओं के पास कोई ठोस बिंदु नहीं है और वे बेबुनियाद आरोप लगा कर एनसीयूआई को हथियाना चाहते हैं, ये मामला कोर्ट में नहीं टिकने वाला है और एनसीयूआई को आसानी से कोर्ट से स्टे मिलने की संभावना है”, टीम के सदस्यों ने कहा।

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