
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) के प्रस्तावित मॉडल उपनियमों पर गठित समिति ने बेंगलुरु स्थित आरबीआई के क्षेत्रीय कार्यालय में दक्षिण भारत के सहकारी बैंकों और महासंघों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया।
दो दिवसीय परामर्श बैठक में कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल के सहकारी बैंकों एवं महासंघों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक के दौरान प्रस्तावित मॉडल उपनियमों के विभिन्न प्रावधानों पर चर्चा की गई तथा प्रतिनिधियों ने अपनी चिंताएं, सुझाव और आपत्तियां आरबीआई समिति के समक्ष रखीं।
परामर्श बैठक दो चरणों में आयोजित की गई। पहले दिन आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल के प्रतिनिधियों ने चर्चा में हिस्सा लिया, जबकि दूसरे दिन कर्नाटक और तमिलनाडु के प्रतिनिधियों के साथ बैठक हुई।
बैठक में विशाखापत्तनम को-ऑपरेटिव अर्बन बैंक, गूटी अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक, काकीनाडा अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक, गायत्री को-ऑपरेटिव अर्बन बैंक, पोचमपल्ली को-ऑपरेटिव अर्बन बैंक और बेंगलुरु सिटी को-ऑपरेटिव बैंक सहित कई यूसीबी के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके अलावा आंध्र प्रदेश स्टेट को-ऑपरेटिव अर्बन बैंक्स एंड क्रेडिट सोसायटीज फेडरेशन, केरल अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक्स फेडरेशन और कर्नाटक यूसीबी फेडरेशन के प्रतिनिधि भी चर्चा में शामिल हुए।
बैठक में प्रमुख रूप से यूनि-स्टेट और मल्टी-स्टेट यूसीबी के लिए अलग-अलग मॉडल उपनियम बनाए जाने की मांग उठी। प्रतिनिधियों ने कहा कि दोनों प्रकार के यूसीबी अलग-अलग विधायी ढांचे के तहत काम करते हैं, इसलिए उनके लिए एक समान और अनिवार्य मॉडल उपनियम लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा।
आंध्र प्रदेश स्टेट को-ऑपरेटिव अर्बन बैंक्स एंड क्रेडिट सोसायटीज फेडरेशन के सचिव और नेफकब के निदेशक चलसानी राघवेंद्र राव ने प्रस्तावित मॉडल उपनियमों को अनिवार्य बनाने का विरोध किया।
राव ने कहा कि सहकारी बैंक राज्य या केंद्रीय सहकारी समितियों से संबंधित कानूनों के तहत पंजीकृत स्वायत्त संस्थाएं हैं। उनके अनुसार, बैंकिंग विनियमन अधिनियम का विस्तार मुख्य रूप से बैंकिंग कारोबार को विनियमित करने के उद्देश्य से किया गया था और इसे सहकारी प्रशासन पर आरबीआई का नियंत्रण बढ़ाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने आगाह किया कि आरबीआई के प्रत्येक निर्देश को यूसीबी के उपनियमों में शामिल करना अनिवार्य करने से सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है और सहकारिता के लोकतांत्रिक स्वरूप को कमजोर कर सकता है। उन्होंने कहा कि उपनियम संबंधित सहकारी कानूनों के तहत सदस्य-शेयरधारकों द्वारा लिए गए निर्णयों को प्रतिबिंबित करते हैं।
प्रतिनिधियों ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के तहत सहकारिता राज्य का विषय है। उन्होंने 97वें संविधान संशोधन द्वारा निर्धारित विधायी सीमाओं का सम्मान किए जाने की मांग की।
प्रतिनिधियों का कहना था कि मॉडल उपनियम सलाहकारी प्रकृति के होने चाहिए, न कि अनिवार्य। साथ ही, सहकारी बैंक की सामान्य सभा को उपनियमों में संशोधन करने का अधिकार बरकरार रहना चाहिए।
बैठक में सहकारी बैंकों के नियमन में ‘दोहरा नियंत्रण’ का मुद्दा भी उठाया गया। प्रतिनिधियों ने आरबीआई के निर्देशों और सहकारी कानूनों के बीच संभावित टकराव की ओर ध्यान दिलाया। इसके अलावा, सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार से आवश्यक अनुमोदन प्राप्त करने में होने वाली देरी का मुद्दा भी उठाया गया।
प्रतिनिधियों ने सुझाव दिया कि आरबीआई, सहकारिता मंत्रालय, सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार (आरसीएस), नेफकब और सहकारी महासंघों के प्रतिनिधियों को शामिल कर एक स्थायी समिति गठित की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस समिति के माध्यम से नए निर्देश जारी करने से पहले आरबीआई के निर्देशों और सहकारी कानूनों के बीच उत्पन्न होने वाले मतभेदों का समाधान किया जा सकेगा।



