
नेशनल फेडरेशन ऑफ अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक्स एंड क्रेडिट सोसाइटीज लिमिटेड (नेफकॉब) की 50वीं वार्षिक आम बैठक (एजीएम) में अर्बन कोऑपरेटिव बैंकों के निदेशकों के लिए 10 साल की कार्यकाल सीमा का मुद्दा प्रमुखता से उठा। देशभर से आए प्रतिनिधियों ने इस प्रतिबंध पर गंभीर चिंता जताते हुए नेफकॉब से इसे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से उठाने की मांग की।
प्रतिनिधियों का कहना था कि 10 साल की कार्यकाल सीमा के कारण सहकारी बैंकों से जुड़े अनुभवी लोगों को अपना पद छोड़ना पड़ सकता है। साथ ही, इसका सदस्यों के अपने प्रतिनिधियों को लोकतांत्रिक तरीके से चुनने के अधिकार पर भी असर पड़ सकता है।
कर्नाटक स्थित मल्लेश्वरम को-ऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन एन.एम. सुरेश ने चर्चा के दौरान इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने सवाल किया कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर अब तक पर्याप्त ध्यान क्यों नहीं दिया गया और नेफकॉब से सदस्य सहकारी बैंकों की चिंताओं के समर्थन में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया।
प्रतिनिधियों की मांग पर एजीएम में 10 साल की कार्यकाल सीमा के विरोध में एक प्रस्ताव पारित किया गया। नेफकॉब के अध्यक्ष लक्ष्मी दास ने कहा कि प्रतिनिधियों ने प्रस्ताव पारित किया है और अब फेडरेशन को तय करना होगा कि इस मुद्दे को आगे किस स्तर पर और किस तरीके से उठाया जाए।
श्री त्यागराजा को-ऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन एम.आर. वेंकटेश ने भी इस प्रतिबंध को सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया। उन्होंने नेफकॉब से इस मामले को उच्चतम स्तर तक ले जाने और केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह के समक्ष भी मुद्दा उठाकर व्यावहारिक समाधान तलाशने का आग्रह किया।
एजीएम में यह सवाल भी उठाया गया कि निदेशकों के कार्यकाल की अवधि को किसी सहकारी बैंक को अनुसूचित बैंक का दर्जा देने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। प्रतिनिधियों ने आशंका जताई कि जिन बैंकों के कुछ निदेशक 10 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं, उन्हें अनुसूचित दर्जा हासिल करने की प्रक्रिया में अप्रत्यक्ष नुकसान हो सकता है, भले ही बैंक अन्य निर्धारित मानदंडों को पूरा करता हो।
आंध्र प्रदेश यूसीबी फेडरेशन के अब्दुल जीलान शेख ने सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक स्वरूप की रक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि सहकारी बैंकों के निर्वाचित निदेशकों पर इस तरह की कार्यकाल सीमा क्यों लागू होनी चाहिए, जबकि अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए ऐसी समान सीमा नहीं है।
नेफकॉब के चेयरमैन एमेरिटस एच.के. पाटिल ने इस मुद्दे के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कार्यकाल सीमा का मामला पहले ही कानूनी और संस्थागत स्तर पर उठाया जा चुका है। उन्होंने बताया कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र की सहकारी बैंकिंग फेडरेशनों ने इस मुद्दे को लेकर अदालतों का रुख किया है। उन्होंने मामले को राजनीतिक रंग देने से बचने और सहकारी संस्थाओं के साथ समान व्यवहार की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
वहीं, असम यूसीबी फेडरेशन के जगदीश वर्मा ने राज्य सहकारी कानूनों और आरबीआई के निदेशकों के कार्यकाल से जुड़े नियमों के बीच अंतर की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने इस संबंध में अधिक स्पष्टता और एकरूपता की जरूरत बताई।



