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उत्तर गुजरात के किसानों के लिए खेती बैंक गेम चेंजर: शाह

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को नई दिल्ली से वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए द गुजरात स्टेट को-ऑपरेटिव एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक (खेतीबैंक) की अहमदाबाद में आयोजित 70 वीं एजीएम को संबोधित किया।

अमित शाह ने कहा कि द गुजरात स्टेट को-ऑपरेटिव एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक लि. जिसे खेती बैंक कहते हैं, उसकी स्थापना 1951 में हुई और उस वर्ष में इसकी स्थापना का ऐतिहासिक महत्व भी है। सौराष्ट्र और काठियावाड़ में उस वक़्त लगभग 222 छोटे-छोटे रजवाडे थे और समग्र सौराष्ट्र की जमीन राजों-रजवाडों के नाम पर थी। किसान राजा के लिए जमीन जोतते थे और अपना जीवनयापन करते थे। परंतु जब राजों-रजवाडों का एकीकरण देश के लौहपुरूष सरदार पटेल के नेतृत्व में हुआ और भारतीय संघ अस्तित्व में आया तब स्वाभाविक तौर से उस जमीन के मालिक किसान बनते।

“लेकिन उस समय राजों-रजवाडों को क़ीमत देने के लिए किसानों के पास पैसा नहीं था और इस कारण वह भूमि उनके नाम नहीं हो सकी। उस समय सरदार पटेल साहब की प्रेरणा से और पोरबंदर के युवराज उदयभान सिंह जी के प्रयासों से एक सौराष्ट्र लैंड मोर्गेज बैंक की स्थापना हुई और किसानों को ऋण देकर उन्हें जमीन का मालिक बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। आज सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात के किसान जमीन के मालिक हैं और इसका सबसे बडा श्रेय इस खेती बैंक को जाता है। उससमय 56 हजार किसान भाईयों को जमीन का मालिक बनाने में इस खेती बैंक ने लोन देकर बहुत बड़ी भूमिका अदा की थीऔर उन 56 हजार किसानों के माध्यम से आज यह संख्या बहुत बडी होने जा रही है”, उन्होंने कहा।

शाह ने आगे कहा कि आज जो जमीन के मालिक हैं, उसका मूल कारण खेती बैंक द्वारा दिया गया ऋण है और बाद में बैंक ने अनेक प्रकार के काम शुरु किए। किसान ज़मीनों के मालिक तो बन गए लेकिन जमीन को समतल करना, सिंचाई की व्यवस्था करनी, कुएं खोदना, खेती के लिए यांत्रिक साधन लाना, ये सब करना बाक़ी था। ऐसे में खेती बैंक ने मध्यम और लंबी अवधि के लिए ऋण देने की जिम्मेदारी लीऔर आज गुजरात के किसानों को एग्रीकल्चर-ईन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए मध्यम और लंबी अवधि के लोन देने का काम खेती बैंक कर रहा है। इस तरह से कितने ही किसानों को साहूकारों के चुंगल से छुडाने का काम खेती बैंक ने किया है। इस द्रष्टि से गुजरात के कृषि क्षेत्र में खेती बैंक का ये बहुत बड़ा योगदान है।

उन्होंने कहा कि देश को अनाज उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान उस समय के प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने किया था। उस समय भी खेती बैंक ने ट्रेक्टर और कुएँ की खुदाई के लिए ऋण देकर आत्मनिर्भर बनाने में बहुत बडा योगदान दिया था।

शाह ने बताया कि नाबार्ड की स्थापना के बाद खेती बैंक का स्वरूप थोड़ा बदला और खेती के साथ-साथ ग्रामीण विकास, कुटीर उद्योग, डेयरी और स्वरोजगार के लिए भी ऋण देने का काम खेती बैंक ने शुरु किया। आज खेती बैंक मध्यम और दीर्घकालीन अवधि के ऋण देने वाली एग्रीकल्चर फायनान्स का सबसे बडाबैंक बनकर सामने आया है।

खेती बैंक के 17 ज़िला कार्यालय और 176 शाखाएं मध्यम और लंबे समय के लिए लोन देते हैं और लगभग 8,42,000 किसानों को लगभग 4543 करोड रूपए का ऋण खेती बैंक ने अभी तक दिया है। इसके सदस्यों की संख्या भी तीन लाख से ज्यादा हो गई है और रिजर्व फंड गत वर्ष के लाभ के बाद 590 करोड रूपए तक पहुंच गया है। फिक्स डिपोजिट 238 करोड रूपए से अधिक हो गया है और एक साल के अंदर खेती बैंक ने लगभग 190 करोड रूपए की ऋण वसूली करकेवित्त बैलंसिंग का काम बहुत अच्छे तरीक़े से किया है।

उन्होंने कहा कि पहले ऋण 12 से 15 प्रतिशत की ब्याज दर पर दिया जाता था, लेकिन अब इसे घटाकर 10 प्रतिशत तक लाया गया है। पहले नियमित ऋण चुकाने के लिए 2 प्रतिशत की रियायत भी नहीं मिलती थी लेकिन अब 2 प्रतिशत रियायत भी दी जाती है।

इसके अलावा कई अन्य प्रकार के बैंकिंग शुल्कों में भी कमी की गई है। ओवरहेड खाताधारको के लिए वन टाईम सेटलमेन्ट स्कीम लाकर वसूली भी की है और खातेदारो पर आनेवाला बोझ भी कम किया है। श्री शाह ने कहा कि आज गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र के जीएससी बैंक, एडीसी बैंक और खेती बैंकमिलकर सभी कन्याओं का सुकन्या समृद्धि योजना के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन करके 25 लाख रूपए का चेक जिला कलेक्टर को देने का निर्णय किया है।

 

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