
वित्तीय अनियमितताओं के चलते पिछले पांच वर्षों में 56 बहु-राज्य सहकारी समितियों (एमएससीएस) को परिसमापन के तहत लाया गया है। केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को लोकसभा को यह जानकारी दी।
लिखित उत्तर में मंत्री ने बताया कि बहु-राज्य सहकारी समितियां अधिनियम, 2002 के तहत पंजीकृत सहकारी संस्थाएं स्वायत्त निकाय होती हैं और मुख्य रूप से अपने सदस्यों के प्रति जवाबदेह रहती हैं। इनका संचालन अधिनियम के प्रावधानों, उससे जुड़े नियमों तथा संबंधित समिति की स्वीकृत उपविधियों के अनुसार किया जाता है।
नियामक ढांचे पर प्रकाश डालते हुए शाह ने कहा कि एमएससीएस अधिनियम की धारा 49 के तहत सदस्यों का प्रवेश, जमा राशि स्वीकार करना अथवा वापस करना जैसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक निर्णय समिति के बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जबकि धारा 52 के अंतर्गत दैनिक प्रशासन की जिम्मेदारी मुख्य कार्यकारी अधिकारी की होती है।
हालांकि, मंत्री ने स्पष्ट किया कि वित्तीय कुप्रबंधन, धन के गबन या जमाकर्ताओं को भुगतान न करने जैसी गंभीर अनियमितताओं के मामलों में सरकार एमएससीएस अधिनियम की धारा 86 के तहत समिति को समापन (वाइंडिंग-अप) की प्रक्रिया में लाती है। इसके बाद धारा 89 के तहत परिसमापक की नियुक्ति की जाती है, जो समिति की परिसंपत्तियों का परिसमापन कर कानून के अनुसार जमाकर्ताओं को भुगतान सुनिश्चित करता है।
मंत्री ने बताया कि वर्ष 2021 से 2025 के बीच विभिन्न राज्यों में कुल 56 बहु-राज्य सहकारी समितियों के परिसमापन के आदेश जारी किए गए। ये समितियां राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, पंजाब, आंध्र प्रदेश, ओडिशा तथा दादरा एवं नगर हवेली में स्थित थीं।
उन्होंने कहा कि परिसमापन के अधिकतर मामले राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से सामने आए, जिनमें मुख्य रूप से क्रेडिट और बहुउद्देश्यीय सहकारी समितियां शामिल थीं। ये संस्थाएं क्रेडिट, बचत, आवास तथा बहुउद्देश्यीय गतिविधियों से जुड़ी थीं।
शाह ने जोर देकर कहा कि परिसमापन की पूरी प्रक्रिया बहु-राज्य सहकारी समितियां अधिनियम, 2002 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार की जाती है, ताकि जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा हो सके और सहकारी क्षेत्र में अनुशासन सुनिश्चित किया जा सके।



