
विज्ञान भवन में आयोजित एक संगोष्ठी के दौरान बहु-राज्य सहकारी समितियों में प्रतिनिधि सामान्य निकाय (आरजीबी) से संबंधित स्पष्ट नियमों की आवश्यकता और चुनाव प्रक्रिया को और सुदृढ़ बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया। यह संगोष्ठी सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा “पारदर्शिता और सुचिता के साथ बहु-राज्य सहकारी समितियों के चुनाव” विषय पर आयोजित की गई थी।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए सहकारिता क्षेत्र के विशेषज्ञ डी. कृष्णा ने कहा कि बहु-राज्य सहकारी समितियां अधिनियम, 2002 में संशोधन के बाद सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण की स्थापना से चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही काफी मजबूत हुई है।
उन्होंने कहा कि सहकारिता मंत्रालय की स्थापना से सहकारिता क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। अमित शाह द्वारा दिए गए “सहकार से समृद्धि” के दृष्टिकोण के मार्गदर्शन में मंत्रालय ने कई महत्वपूर्ण पहलें शुरू की हैं। इनमें प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) का आधुनिकीकरण, राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस का निर्माण और सहकारी संस्थाओं के प्रशासनिक ढांचे को सुदृढ़ करना शामिल है।
डी. कृष्णा ने 2023 के संशोधनों के तहत लागू नई चुनावी व्यवस्था का उल्लेख करते हुए बताया कि सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण, जिसके प्रमुख डी. के. सिंह हैं, ने कम समय में लगभग 225 बहु-राज्य सहकारी समितियों में चुनाव संपन्न कराए हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राज्यों में फैले बड़े सदस्य आधार वाली सहकारी संस्थाओं में चुनाव कराना प्रशासनिक और लॉजिस्टिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
उन्होंने विशेष रूप से शहरी सहकारी बैंकों और राष्ट्रीय स्तर के सहकारी संघों जैसी संस्थाओं में प्रतिनिधि सामान्य निकाय (आरजीबी) की कार्यप्रणाली को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कानून में प्रतिनिधि आधारित निकाय के गठन का प्रावधान तो है, लेकिन स्पष्ट संचालन दिशा-निर्देशों के अभाव में चुनाव प्रक्रिया में भ्रम और असंगतियां उत्पन्न होती हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए डी. कृष्णा ने सुझाव दिया कि कानून में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किस सदस्य संख्या के बाद आरजीबी का गठन अनिवार्य होगा। साथ ही, प्रत्येक प्रतिनिधि कितने सदस्यों का प्रतिनिधित्व करेगा, निर्वाचन क्षेत्रों का गठन कैसे होगा और प्रतिनिधियों का चुनाव किस प्रक्रिया से किया जाएगा, यह भी स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आरजीबी के चुनाव सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण की निगरानी में कराए जाने चाहिए, ताकि पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हो सके।
डी. कृष्णा ने यह भी जोर दिया कि मौजूदा प्रबंधन समिति का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही चुनाव कराए जाने चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि चुनाव में देरी होने पर प्रशासकों की नियुक्ति करनी पड़ सकती है, जो सहकारी संस्थाओं के लोकतांत्रिक संचालन के लिए अनुकूल नहीं है।
भविष्य की दिशा पर बोलते हुए उन्होंने सहकारी चुनावों में तकनीक के व्यापक उपयोग की वकालत की। विशेष रूप से भौगोलिक रूप से फैले सदस्य आधार वाली संस्थाओं में इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। साथ ही, 97वें संवैधानिक संशोधन के प्रावधानों के अनुरूप सक्रिय सदस्यता के आधार पर सटीक और अद्यतन मतदाता सूची तैयार करने की जरूरत भी बताई।
अपने संबोधन के अंत में डी. कृष्णा ने कहा कि सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण ने बहु-राज्य सहकारी संस्थाओं में पारदर्शी चुनाव प्रणाली को स्थापित करने की दिशा में सराहनीय कार्य किया है, लेकिन प्रतिनिधि सामान्य निकाय से संबंधित नियमों में और अधिक स्पष्टता तथा तकनीक के व्यापक उपयोग से सहकारिता क्षेत्र में लोकतांत्रिक भागीदारी और सुशासन को और मजबूत किया जा सकता है।



