
जमा बीमा एवं ऋण गारंटी निगम (डीआईसीजीसी) ने भारतीय रिज़र्व बैंक की स्वीकृति से जमा बीमा के लिए जोखिम-आधारित प्रीमियम व्यवस्था लागू करने की घोषणा की है। यह नई व्यवस्था 1 अप्रैल 2026 से प्रभाव में आएगी।
वर्तमान में सभी बीमाकृत बैंक अपनी वित्तीय स्थिति अथवा जोखिम स्तर की परवाह किए बिना प्रत्येक 100 रुपये के आकलनीय जमाओं पर 12 पैसे की समान प्रीमियम दर का भुगतान करते हैं। नई व्यवस्था के अंतर्गत इस समान दर प्रणाली को समाप्त कर जोखिम-संवेदनशील प्रीमियम संरचना अपनाई जाएगी, जिसमें प्रीमियम दरें बैंक की जोखिम प्रोफ़ाइल और परिचालन इतिहास के आधार पर तय होंगी।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, ग्रामीण सहकारी बैंक (राज्य सहकारी बैंक एवं जिला केंद्रीय सहकारी बैंक) तथा शहरी सहकारी बैंकों के लिए डीआईसीजीसी स्तर-2 जोखिम मूल्यांकन मॉडल लागू करेगा।
इस मॉडल के अंतर्गत बैंकों का मूल्यांकन पूंजी पर्याप्तता एवं गुणवत्ता, परिसंपत्ति गुणवत्ता, तरलता स्थिति, लाभप्रदता, तथा बैंक के विफल होने की स्थिति में जमा बीमा कोष पर संभावित हानि जैसे वस्तुनिष्ठ वित्तीय मानकों के आधार पर किया जाएगा। इसके साथ ही कॉरपोरेट प्रशासन मानकों, जैसे अनिवार्य प्रमुख प्रबंधन कार्मिकों की उपलब्धता और पेशेवर निदेशकों की नियुक्ति, को भी मूल्यांकन में शामिल किया जाएगा।
मूल्यांकन के आधार पर बैंकों को ए, बी, सी एवं डी-चार जोखिम श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाएगा, जिसमें श्रेणी ‘ए’ न्यूनतम जोखिम को दर्शाएगी। इसके अनुरूप प्रीमियम दरें प्रत्येक 100 रुपये के आकलनीय जमाओं पर 8 पैसे से 12 पैसे के बीच निर्धारित होंगी। श्रेणी ‘ए’ के बैंक सबसे कम प्रीमियम का भुगतान करेंगे, जबकि श्रेणी ‘डी’ के बैंक वर्तमान 12 पैसे की दर पर ही प्रीमियम देते रहेंगे।
नई व्यवस्था में दीर्घकाल से सुचारु रूप से संचालित एवं सुशासित संस्थानों को प्रोत्साहित करने के लिए वरिष्ठता प्रोत्साहन (विंटेज इंसेंटिव) का भी प्रावधान किया गया है। स्तर-2 श्रेणी के अंतर्गत आने वाले पात्र सहकारी बैंकों एवं क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को, यदि उन्होंने बिना किसी पुनर्गठन अथवा गंभीर वित्तीय संकट के 25 वर्ष की संतोषजनक परिचालन अवधि पूर्ण की है, तो 25 प्रतिशत की प्रीमियम छूट प्रदान की जाएगी।
हालांकि, पर्यवेक्षणीय कार्रवाई ढांचा अथवा तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई ढांचा के अंतर्गत आने वाले शहरी सहकारी बैंक फिलहाल 12 पैसे की समान प्रीमियम दर का ही भुगतान करते रहेंगे। ऐसे बैंकों को इन निगरानी ढांचों से बाहर निकलने के बाद अगले वित्तीय वर्ष में ही जोखिम-आधारित प्रीमियम व्यवस्था में शामिल किया जाएगा।
डीआईसीजीसी ने स्पष्ट किया है कि बैंकों की जोखिम श्रेणी एवं प्रीमियम वर्गीकरण से संबंधित जानकारी गोपनीय रूप से केवल बैंक प्रबंधन को उपलब्ध कराई जाएगी, और इसका उपयोग किसी भी प्रकार के व्यावसायिक प्रचार या विपणन के लिए नहीं किया जा सकेगा।
जोखिम-आधारित प्रीमियम व्यवस्था की कम से कम प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार समीक्षा की जाएगी। इस पहल से बेहतर जोखिम प्रबंधन, वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा मिलने तथा सुशासित सहकारी बैंकों को कम जमा बीमा लागत का लाभ मिलने की अपेक्षा है।



