
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने सोमवार को मुंबई में चुनिंदा शहरी सहकारी बैंकों के अध्यक्षों तथा प्रबंध निदेशकों एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की। बैठक में आरबीआई के उप-गवर्नर जे. स्वामीनाथन और एस. सी. मूर्ति सहित रिज़र्व बैंक के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।
इस प्रकार की पिछली बैठक 19 मार्च 2025 को आयोजित की गई थी।
इस बैठक में देश के प्रमुख शहरी सहकारी बैंकों ने भाग लिया, जिनमें सरस्वत बैंक (अध्यक्ष: गौतम ठाकुर), एसवीसी बैंक (अध्यक्ष: दुर्गेश चांदावरकर; सीईओ: रविंदर सिंह), टीजेएसबी बैंक (अध्यक्ष: शरद गांगल), कॉसमॉस को-ऑपरेटिव बैंक (अध्यक्ष: एडवोकेट प्रल्हाद कोकरे), जनता सहकारी बैंक, पुणे (अध्यक्ष: रवींद्र हेजीब; सीईओ: जगदीश कश्यप) और भारत को-ऑपरेटिव बैंक (अध्यक्ष: सूर्यकांत जया सुवर्णा; सीईओ: विद्यानंद करकरा) शामिल रहे। महाराष्ट्र, केरल, गोवा और राजस्थान से लगभग 45 वरिष्ठ हितधारकों ने इस संवाद में भाग लिया।
बैठक में नेशनल फेडरेशन ऑफ अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक्स के उपाध्यक्ष मिलिंद काले तथा नेशनल अर्बन को-ऑपरेटिव फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के अध्यक्ष ज्योतिंद्र मेहता और सीईओ प्रभात चतुर्वेदी ने भी हिस्सा लिया। लगभग दो घंटे चली इस बैठक में सहकारी बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।
अपने संबोधन में आरबीआई गवर्नर ने कहा कि शहरी सहकारी बैंकों की भूमिका आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से अर्ध-शहरी और वंचित क्षेत्रों में ऋण उपलब्ध कराने तथा वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाने में उनका अहम योगदान है। उन्होंने पिछली बैठक के बाद सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के लिए आरबीआई द्वारा किए गए विभिन्न नीतिगत उपायों का उल्लेख किया और विश्वास जताया कि ये कदम यूसीबी को अधिक मजबूत, स्वस्थ और टिकाऊ बनाने में सहायक सिद्ध होंगे।
गवर्नर ने सुशासन, मजबूत अंडरराइटिंग प्रक्रियाओं और परिसंपत्ति गुणवत्ता पर सख्त निगरानी की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, उन्होंने ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण, नैतिक आचरण और समयबद्ध शिकायत निवारण को सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने और उसे और सुदृढ़ करने के लिए अनिवार्य बताया।
इंटरएक्टिव सत्र के दौरान सहकारी बैंकों के प्रतिनिधियों ने नीतिगत और परिचालन संबंधी मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं। प्रतिभागियों ने यह स्वीकार किया कि समग्र रूप से यूसीबी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन लाभप्रदता (प्रॉफिटेबिलिटी) के क्षेत्र में और सुधार की आवश्यकता है।
‘इंडियन कोऑपरेटिव’ से बातचीत में बैठक में शामिल एक प्रतिभागी ने बताया कि प्रस्तावित 10 वर्षीय निदेशक कार्यकाल मानदंड, अयोग्य निदेशकों से संबंधित हालिया राजपत्र अधिसूचना तथा अन्य महत्वपूर्ण विषयों को बैठक में उठाया गया। हालांकि, आरबीआई ने इन सुझावों पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की।
बैठक में सहकारी बैंकों की पूंजी आधार को मजबूत करने के लिए बिना मतदान अधिकार वाले विशेष शेयर जारी करने का सुझाव भी दिया गया, ताकि सहकारी स्वरूप को प्रभावित किए बिना पूंजी सुदृढ़ की जा सके।
इसके अलावा, क्षमता निर्माण, संरचित प्रशिक्षण कार्यक्रमों और यूसीबी में नेतृत्व विकास पर विशेष जोर दिया गया। प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, विशेष रूप से कमजोर वर्गों को ऋण देने से जुड़े मुद्दों तथा नियामकीय परिपत्रों के माध्यम से अधिक स्पष्टता की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।
बैठक में कई छोटे लेकिन महत्वपूर्ण परिचालन मुद्दों का समाधान किया गया, जो नियामक की सक्रिय और परामर्शात्मक कार्यशैली को दर्शाता है। नेताओं ने सहकारी बैंकों में सदस्यता की दो श्रेणियों, छोटे मूल्य के ऋणों (जैसे गृह मरम्मत ऋण) की सीमा की समीक्षा तथा आवास ऋण की वर्तमान 20 वर्ष की सीमा को बढ़ाने के सुझाव भी रखे।
कुल मिलाकर, यह बैठक शहरी सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के साथ आरबीआई की निरंतर सहभागिता और सहयोग की प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जिसका उद्देश्य बेहतर सुशासन, अधिक पारदर्शिता और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करना है, ताकि सहकारी बैंक जमीनी स्तर पर एक सशक्त और विश्वसनीय वित्तीय संस्थान के रूप में अपनी भूमिका निभाते रहें।



