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सहकारिता का करिश्मा: 30 क्षेत्रों में 6.6 लाख सक्रिय संस्थाएं, 32 करोड़ सदस्य

भारत में सहकारी आंदोलन को “वसुधैव कुटुंबकम” की प्राचीन भारतीय अवधारणा से दार्शनिक आधार प्राप्त है, जो संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानते हुए आपसी सम्मान, साझा जिम्मेदारी और सार्वभौमिक एकजुटता के मूल्यों पर बल देती है। सामूहिक कल्याण की यही स्थायी भावना भारत में सहकारी संस्थाओं के विकास को दिशा दे रही है, जहां समुदाय-केंद्रित विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।

“सहकार से समृद्धि” के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर भारत सरकार सहकारी मॉडल को अपनी समग्र विकास रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ मानते हुए इसे सशक्त और विस्तारित करने पर लगातार कार्य कर रही है। इसके तहत जमीनी स्तर तक पहुंच को गहरा करने के साथ-साथ सक्षम नीतिगत, कानूनी और संस्थागत ढांचे के निर्माण पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

भारत में सहकारी समितियां कृषि, ऋण, बैंकिंग, आवास, दुग्ध, मत्स्य और महिला कल्याण सहित अनेक क्षेत्रों में सक्रिय हैं और विश्व की कुल सहकारी संस्थाओं में इनकी हिस्सेदारी एक-चौथाई से भी अधिक है। दिसंबर 2025 तक राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस (एनसीडी) में 8.5 लाख से अधिक सहकारी समितियां पंजीकृत हैं, जिनमें से लगभग 6.6 लाख सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।

ये संस्थाएं ग्रामीण भारत के लगभग 98 प्रतिशत क्षेत्र को कवर करती हैं और 30 से अधिक क्षेत्रों में करीब 32 करोड़ सदस्यों को सेवाएं प्रदान कर रही हैं। सहकारी संस्थाएं दूध उत्पादकों, कारीगरों, मछुआरों, व्यापारियों और श्रमिकों को बाजार से जोड़ने का कार्य कर रही हैं। वहीं, महिलाओं के नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों के साथ सहकारी संस्थाओं के जुड़ाव से लगभग 10 करोड़ महिलाएं इस ढांचे में शामिल हुई हैं। अमूल जैसी राष्ट्रीय पहचान वाली संस्थाओं से लेकर नाबार्ड, कृभको और इफ्को जैसी प्रमुख सहकारी संस्थाओं तथा हजारों स्थानीय समितियों तक, सहकारिता भारत की आर्थिक संरचना का एक मजबूत आधार बन चुकी है।

सहकारिता मंत्रालय ने सहकारी समितियों और उनके सदस्यों की बढ़ती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण पहलें शुरू की हैं। “सहकार से समृद्धि” की सोच से निर्देशित इन प्रयासों का उद्देश्य देशभर में सहकारी आंदोलन को मजबूती प्रदान करना और सहकारी संस्थाओं को उनकी पूर्ण आर्थिक एवं सामाजिक क्षमता के अनुरूप विकसित करना है।

भारत सरकार ने अगले पांच वर्षों में देश की सभी पंचायतों और गांवों को पूरी तरह कवर करने के लक्ष्य से नई बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स), डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों की स्थापना की योजना को स्वीकृति प्रदान की है। राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस के अनुसार अब तक 32,009 नई पैक्स, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों का पंजीकरण किया जा चुका है। वर्तमान में पैक्स 2,55,881 ग्राम पंचायतों में कार्यरत हैं, जबकि डेयरी सहकारी समितियां 87,159 ग्राम पंचायतों और मत्स्य सहकारी समितियां देशभर की 29,964 ग्राम पंचायतों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं।

किसानों को बाजार से जोड़ने और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने के लिए एफपीओ योजना के तहत सहकारी क्षेत्र में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) को 1,100 अतिरिक्त किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का आवंटन किया गया है। इसके माध्यम से पैक्स अब एफपीओ के रूप में कृषि से जुड़ी अन्य आर्थिक गतिविधियां भी संचालित कर सकेंगी। अब तक एनसीडीसी द्वारा सहकारी क्षेत्र में कुल 1,863 एफपीओ का गठन किया गया है, जिनमें से 1,117 एफपीओ पैक्स को सुदृढ़ करके बनाए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत अब तक एफपीओ/सीबीबीओ को 206 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता वितरित की जा चुकी है।

मत्स्य क्षेत्र में मछुआरों को बेहतर बाजार संपर्क और प्रसंस्करण सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एनसीडीसी ने प्रारंभिक चरण में 70 मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों (एफएफपीओ) का पंजीकरण किया है। भारत सरकार के मत्स्य विभाग ने एनसीडीसी को 1,000 मौजूदा मत्स्य सहकारी समितियों को एफएफपीओ में परिवर्तित करने के लिए 225.50 करोड़ रुपये का आवंटन स्वीकृत किया है। एनसीडीसी अब तक 1,070 एफएफपीओ के गठन में सहायता प्रदान कर चुका है, जबकि 2,348 एफएफपीओ को सुदृढ़ करने का कार्य प्रगति पर है। इस योजना के तहत एफएफपीओ/सीबीबीओ को 98 करोड़ रुपये की राशि वितरित की जा चुकी है।

साथ ही, कोऑपरेटिव बैंक मित्र पहल के माध्यम से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन को और मजबूत किया जा रहा है, जिससे सहकारी बैंकिंग सेवाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकें।

इन सभी प्रयासों के माध्यम से सहकारी आंदोलन को एक आधुनिक, समावेशी और बहुआयामी स्वरूप दिया जा रहा है, जो न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बना रहा है, बल्कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में देश को तेजी से आगे बढ़ा रहा है।

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