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पाँच करोड़ गन्ना किसान परिवार संकट में; एनएफसीएसएफ ने पीएम से हस्तक्षेप की मांग की

देश के पाँच करोड़ से अधिक गन्ना किसान परिवार गहरे आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। चीनी क्षेत्र में लगातार बढ़ते उत्पादन खर्च और स्थिर चीनी कीमतों के चलते किसानों और सहकारी चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति गंभीर होती जा रही है। इसी को लेकर नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज़ लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में एनएफसीएसएफ के अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटिल ने कहा कि भले ही किसानों को उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) का भुगतान किया जा रहा है, लेकिन कुल गन्ना भुगतान में लगातार गिरावट आई है। वर्ष 2022-23 में किसानों को जहाँ 2.15 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था, वहीं 2024-25 में यह घटकर 2.03 लाख करोड़ रुपये रह गया है। इससे किसानों को सालाना करीब 12,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।

उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में रंगराजन समिति की राजस्व-साझेदारी व्यवस्था लागू होने के बावजूद किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि चीनी मिलों को चीनी की बिक्री से प्राप्त मूल्य उत्पादन लागत से कम है। वर्तमान में गन्ना उत्पादन की लागत (कटाई और परिवहन सहित) 4,000 रुपये प्रति टन से अधिक हो चुकी है, जबकि औसत चीनी प्राप्ति लगभग 2,375 रुपये प्रति क्विंटल है। इससे मिलों के लिए समय पर गन्ना भुगतान करना कठिन हो गया है।

एनएफसीएसएफ ने यह भी चिंता जताई कि देश की करीब 70 प्रतिशत चीनी खपत बड़े संस्थागत खरीदारों, जैसे पेय पदार्थ कंपनियों, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों, होटल, रेस्तरां और कन्फेक्शनरी उद्योग, द्वारा की जाती है। ये खरीदार चीनी को घरेलू उपभोक्ताओं के समान कीमत पर खरीदते हैं, जिससे किसानों को एफआरपी से आगे कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिल पाता।

फेडरेशन ने मांग की है कि चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य (एमएसपी) गन्ने के एफआरपी और एथेनॉल कीमतों से गतिशील रूप से जोड़ा जाए, जैसा कि धान और गेहूं के लिए किया जाता है। एनएफसीएसएफ का कहना है कि यदि चीनी का एमएसपी 150 रुपये प्रति किलो किया जाता है, तो इससे सरकारी खजाने पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 28,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ उत्पन्न हो सकता है। इससे गन्ने की कीमत में करीब 2,670 रुपये प्रति टन की बढ़ोतरी संभव है।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि सरकार ने एथेनॉल मिश्रण में 20 प्रतिशत लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया है, लेकिन एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम (ईबीपी) में गन्ना आधारित एथेनॉल की हिस्सेदारी घटकर 30 प्रतिशत से भी कम रह गई है। पाटिल ने इसके लिए तेल विपणन कंपनियों द्वारा कम आवंटन और वर्ष 2022 के बाद एथेनॉल कीमतों में संशोधन न होने को जिम्मेदार ठहराया।

एनएफसीएसएफ ने चेतावनी दी कि मौजूदा मूल्य परिदृश्य के कारण किसान गन्ने से हटकर धान और मक्का जैसी अधिक जल एवं उर्वरक-आधारित फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे पर्यावरणीय दबाव और आयात निर्भरता बढ़ सकती है। फेडरेशन के अनुसार, गन्ना आधारित एथेनॉल अनाज आधारित एथेनॉल की तुलना में अधिक टिकाऊ, किफायती और संसाधन-कुशल है।

गन्ने को राष्ट्रीय महत्व की फसल बताते हुए एनएफसीएसएफ ने सरकार से राष्ट्रीय गन्ना मिशन शुरू करने, चीनी उद्योग के लिए एथेनॉल आवंटन बढ़ाने, एथेनॉल खरीद मूल्य में संशोधन करने, चीनी मिलों द्वारा उत्पादित हरित ऊर्जा के लिए दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते लागू करने तथा एफआरपी और लागत से जुड़ा गतिशील मूल्य निर्धारण ढांचा अपनाने की अपील की है।

पाटिल ने कहा कि गन्ना क्षेत्र को मजबूत करना ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य से जुड़ा है, क्योंकि यह नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देता है, आयात निर्भरता घटाता है, ग्रामीण रोजगार सृजित करता है और समावेशी विकास को समर्थन देता है। फेडरेशन ने सरकार से समय रहते नीतिगत हस्तक्षेप कर लाखों छोटे और सीमांत किसानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।

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