
महाराष्ट्र में सहकारी चीनी मिलों के सामने आ रही चुनौतियों पर विचार-विमर्श के लिए बुधवार को मुंबई स्थित शुगर भवन में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता राज्य के सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटिल ने की। इसमें राजनीतिक नेताओं, सहकारिता क्षेत्र के प्रतिनिधियों तथा वित्तीय संस्थानों के अधिकारियों ने भाग लिया।
बैठक में जल संसाधन मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल, पूर्व मंत्री एवं विधायक जयंत पाटिल, विधायक प्रकाशसिंह सोलंके और अभिमन्यु पवार, पूर्व मंत्री हर्षवर्धन पाटिल तथा महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक के प्रशासकीय मंडल के अध्यक्ष विद्याधर अनास्कर सहित राज्यभर की सहकारी चीनी मिलों के प्रतिनिधि और सहकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
बैठक में सहकारी चीनी मिलों के सामने खड़ी वित्तीय और संचालन संबंधी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान गन्ने के न्यूनतम समर्थन मूल्य, यानी फेयर एंड रेम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) के मुद्दे पर भी विचार किया गया। उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने बताया कि एफआरपी से किसानों को बेहतर कीमत मिलती है, लेकिन बाजार में चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण मिलों को समय पर भुगतान करने में कठिनाई होती है।
इसके अलावा उत्पादन लागत में वृद्धि, ऊर्जा और श्रम खर्च में बढ़ोतरी तथा पुरानी मशीनरी के आधुनिकीकरण की आवश्यकता जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सहकारी चीनी मिलों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए एथेनॉल उत्पादन, बिजली सह-उत्पादन और अन्य उप-उत्पादों के माध्यम से विविधीकरण पर जोर दिया।
बैठक में यह भी बताया गया कि सहकारी चीनी मिलें कार्यशील पूंजी और आधुनिकीकरण के लिए मुख्य रूप से महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक और जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों पर निर्भर रहती हैं, लेकिन बढ़ते एनपीए और कड़े ऋण मानदंडों के कारण वित्तपोषण चुनौतीपूर्ण हो गया है।
बैठक में सहकारी चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने के लिए नीतिगत सहयोग और वित्तीय पुनर्गठन की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। उपस्थित नेताओं ने कहा कि सहकारी चीनी मिलें केवल औद्योगिक इकाइयां नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं, इसलिए उनकी मजबूती किसानों की आय और ग्रामीण विकास के लिए बेहद जरूरी है।



