
गुजरात सरकार ने राज्य भर की सहकारी संस्थाओं की प्रबंध समितियों के चुनाव छह माह के लिए स्थगित कर दिए हैं। यह निर्णय गुजरात सहकारी समितियां अधिनियम, 1961 के तहत लिया गया है और अधिसूचना तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है।
अधिसूचना के अनुसार, जिन निर्दिष्ट सहकारी संस्थाओं के प्रबंध समिति चुनाव सामान्यतः अधिनियम की धारा 74(जी) को धारा 145(ए) से 145(वी) के साथ पढ़ते हुए कराए जाते हैं, उन प्रावधानों को अस्थायी रूप से स्थगित किया गया है। राज्य सरकार ने अधिनियम की धारा 161 के तहत प्रदत्त विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए, अधिसूचना की तिथि से छह माह की अवधि के लिए सभी ऐसी संस्थाओं को इन प्रावधानों से छूट प्रदान की है।
इस निर्णय से अमरेली जिला केंद्रीय सहकारी बैंक, सूरत जिला केंद्रीय सहकारी बैंक और राजकोट जिला केंद्रीय सहकारी बैंक सहित कई जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों को राहत मिलने की संभावना है, जिनकी बोर्ड अवधि शीघ्र समाप्त होने वाली थी। चुनाव स्थगित होने के कारण, मौजूदा बोर्ड छूट अवधि समाप्त होने तक अपना कार्यकाल जारी रख सकेंगे।
सरकार ने चुनाव स्थगित करने का मुख्य कारण मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण बताया है। सरकार का कहना है कि मतदाता सूची संशोधन की संवेदनशीलता और समयबद्धता को देखते हुए सहकारी चुनावों का समानांतर आयोजन प्रशासनिक रूप से कठिन होता। यह स्थगन इसलिए किया गया है ताकि दोनों वैधानिक दायित्वों का निर्वहन सटीकता और निष्पक्षता से किया जा सके।
अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि यह छूट उन सभी निर्दिष्ट सहकारी संस्थाओं पर लागू होगी, जिनके चुनाव इस छह माह की अवधि के दौरान होने वाले हैं या प्रारंभ किए जाने हैं। हालांकि, जिन संस्थाओं में चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है या न्यायालय के आदेश अथवा निर्णय के तहत चुनाव कराना अनिवार्य है, उन्हें इस छूट से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है। ऐसे मामलों में चुनाव न्यायालय के निर्देशानुसार ही होंगे।
सहकारी क्षेत्र से इस निर्णय पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। कुछ पदाधिकारियों ने इसे प्रशासनिक मजबूरियों को देखते हुए व्यावहारिक कदम बताया है, जबकि अन्य ने बोर्डों के लगातार विस्तार और चुनावों में देरी को लेकर चिंता जताई है। जानकारों का कहना है कि गुजरात में सहकारी चुनावों में देरी का मुद्दा कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय बनता जा रहा है।



