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यूसीबी लाइसेंसिंग; आरबीआई ने लोगों से मांगी प्रतिक्रिया

दो दशक से अधिक समय के अंतराल के बाद भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने मंगलवार को शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) को नए लाइसेंस जारी करने की संभावनाओं पर औपचारिक सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया शुरू की। इसके तहत आरबीआई ने एक विस्तृत चर्चा पत्र (डिस्कशन पेपर) जारी किया है। उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक के उदारीकरण काल में क्षेत्र में उत्पन्न वित्तीय अस्थिरता के मद्देनज़र वर्ष 2004 से नए यूसीबी लाइसेंस जारी करने पर रोक लगी हुई है।

आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यदि लाइसेंसिंग पुनः शुरू की जाती है, तो इसका दृष्टिकोण अत्यंत सतर्क और चयनात्मक होगा। चर्चा पत्र के अनुसार, प्रारंभिक चरण में बड़ी, सुशासित और सुदृढ़ सहकारी ऋण संस्थाओं को लाइसेंस देने पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि अतीत में छोटी संस्थाओं में अपेक्षाकृत अधिक कमजोरियाँ देखी गई हैं।

प्रस्ताव के अनुसार, पात्र सहकारी ऋण संस्थाओं के पास न्यूनतम 300 करोड़ रुपये की पूंजी, कम से कम 10 वर्षों का परिचालन अनुभव, मजबूत और निरंतर वित्तीय रिकॉर्ड, पूंजी पर्याप्तता अनुपात (सीआरएआर) कम से कम 12 प्रतिशत, तथा लाइसेंस जारी किए जाने के समय शुद्ध एनपीए 3 प्रतिशत से कम होना आवश्यक होगा। आरबीआई ने यह भी संकेत दिया है कि बहु-राज्य सहकारी समितियों या व्यापक भौगोलिक उपस्थिति वाली संस्थाओं को प्राथमिकता दी जा सकती है, जिससे विविधीकरण, स्थिरता और दीर्घकालिक टिकाऊपन को बढ़ावा मिलेगा।

चर्चा पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि यूसीबी के लिए शासन और प्रबंधन मानक, उनकी सहकारी संरचना के बावजूद, वाणिज्यिक बैंकों के समकक्ष होने चाहिए। इसके लिए राज्य सहकारी समिति अधिनियमों तथा बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है, ताकि पेशेवर बोर्डों की स्थापना, स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति और शेयरधारिता पर कड़े नियामक प्रावधान सुनिश्चित किए जा सकें।

आरबीआई ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देते हुए बताया कि 1993 से 2001 के बीच 823 यूसीबी लाइसेंस जारी किए गए थे, जिनमें से लगभग 31 प्रतिशत बाद में वित्तीय रूप से अस्वस्थ हो गए। इन्हीं कमजोरियों और उस समय क्षेत्र की नाजुक स्थिति को देखते हुए वर्ष 2004 में यह निर्णय लिया गया था कि जब तक एक समग्र कानूनी और नियामक ढांचा तैयार नहीं हो जाता, तब तक नए लाइसेंस जारी नहीं किए जाएंगे।

चर्चा पत्र में कहा गया है कि पिछले दो दशकों में यूसीबी का परिचालन परिवेश काफी बदल चुका है। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 का लागू होना रहा, जिससे आरबीआई की पर्यवेक्षण और शासन संबंधी शक्तियाँ मजबूत हुईं और यूसीबी को वाणिज्यिक बैंकों के नियामक मानकों के करीब लाया गया। इसके बाद जमा राशि के आधार पर यूसीबी को चार श्रेणियों में वर्गीकृत करने वाला स्तरीय नियामक ढांचा भी लागू किया गया।

आरबीआई ने क्षेत्र की स्थिरता में एकीकरण (कंसोलिडेशन) की भूमिका को भी रेखांकित किया। वर्ष 2003 में जहाँ यूसीबी की संख्या 2,100 से अधिक थी, वहीं 31 मार्च 2025 तक यह घटकर 1,457 रह गई है। उल्लेखनीय है कि 2020 के बाद जिन 57 दिवालिया यूसीबी के लाइसेंस रद्द किए गए, वे सभी टियर-1 से टियर-3 श्रेणियों के थे, जो छोटी बैंकों में जारी कमजोरियों की ओर संकेत करता है।

हालाँकि, कुल मिलाकर क्षेत्र की वित्तीय स्थिति में सुधार देखा गया है। 31 मार्च 2025 तक यूसीबी क्षेत्र में जमा राशि 5.84 लाख करोड़ रुपये, परिसंपत्तियाँ 7.38 लाख करोड़ रुपये और शुद्ध एनपीए मात्र 0.7 प्रतिशत रहे। इसके बावजूद चर्चा पत्र में शासन संबंधी कमियों, पूंजी की सीमाओं, तकनीकी अंतराल और साइबर सुरक्षा जोखिमों को लेकर चिंता जताई गई है। वर्तमान में 82 यूसीबी आरबीआई के पर्यवेक्षणीय प्रतिबंधों के तहत हैं।

आरबीआई ने हितधारकों से अपने ‘कनेक्ट टू रेगुलेट’ पोर्टल के माध्यम से सुझाव और टिप्पणियाँ आमंत्रित की हैं। प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर यूसीबी लाइसेंसिंग पर मसौदा दिशानिर्देश जारी किए जा सकते हैं, जिन्हें आगे सार्वजनिक परामर्श के लिए रखा जाएगा। सुझाव भेजने की अंतिम तिथि 13 फरवरी 2026 निर्धारित की गई है।

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