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उर्वरक आत्मनिर्भरता के लिए रोडमैप तैयार, नीति बदलाव की मांग

राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी ने उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की रूपरेखा तैयार करने के उद्देश्य से एक विचार-मंथन सत्र आयोजित किया। इस सत्र में सरकार, शिक्षा जगत, उर्वरक उद्योग और किसानों के प्रतिनिधियों ने भाग लेते हुए आत्मनिर्भरता को समय की आवश्यकता बताया।

सत्र के बाद आयोजित संवाददाता सम्मेलन में डॉ. एम.एल. जाट, जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक और अकादमी के अध्यक्ष हैं, ने कहा कि भारत ने 2047 तक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है, जिसमें कृषि क्षेत्र की भूमिका अहम होगी। उन्होंने बताया कि हरित क्रांति के समय उर्वरकों ने उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन अब चुनौती उनके अंधाधुंध और असंतुलित उपयोग को नियंत्रित करने की है।

उन्होंने बताया कि देश में हर साल लगभग 33 मिलियन टन उर्वरकों की खपत होती है, जिसमें बड़ी मात्रा आयात पर निर्भर है। ऐसे में आयात निर्भरता कम करने के लिए अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक रणनीतियों की जरूरत है। मृदा स्वास्थ्य को मजबूत करना, संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना और किसानों में जागरूकता फैलाना प्रमुख कदम बताए गए।

डॉ. जाट ने सटीक पोषक तत्व प्रबंधन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और सेंसर-आधारित तकनीकों के उपयोग पर जोर दिया। साथ ही, दालों और तिलहनों की ओर फसल विविधीकरण, ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ के तहत जैविक कचरे का पुनर्चक्रण और जैविक स्रोतों के उपयोग को बढ़ाने को भी आवश्यक बताया।

विचार-विमर्श में प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि उर्वरक अनुसंधान को मजबूत करते हुए स्मार्ट वैकल्पिक उर्वरकों का विकास किया जाए। साथ ही, ग्लूकोनाइट, फॉस्फेट चट्टान, अभ्रक और पॉलीहेलाइट जैसे स्वदेशी खनिजों के उपयोग तथा मिट्टी के माइक्रोबायोम की क्षमता को बढ़ाने पर जोर दिया गया। अच्छी कृषि पद्धतियों (जीएपी) के तहत संतुलित पोषण, फसल विविधीकरण और अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा देने की भी सिफारिश की गई।

बैठक में एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के लिए मिशन मोड कार्यक्रम शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया, जिसका लक्ष्य अगले तीन वर्षों में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग का कम से कम 25% हिस्सा जैविक खाद से प्रतिस्थापित करना है। ‘भारत विस्तार’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से तकनीकों के व्यापक प्रसार पर भी बल दिया गया।

नीतिगत स्तर पर यूरिया को पोषक तत्व-आधारित सब्सिडी के दायरे में लाने, सब्सिडी को मृदा स्वास्थ्य कार्ड से जोड़ने और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता पर सहमति बनी।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से पोषक तत्वों की दक्षता कम होती है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है और मिट्टी तथा जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। ऐसे में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए नीतिगत सुधार, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार का समन्वित प्रयास आवश्यक होगा।

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