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चीनी क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं पर एनएफसीएसएफ ने सचिव से की मुलाकात

देश में चीनी की कुल उपलब्धता स्थिर रहने के बावजूद सहकारी चीनी क्षेत्र में वित्तीय संकट गहराता जा रहा है। इस स्थिति को लेकर राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) ने केंद्र सरकार से त्वरित नीतिगत हस्तक्षेप की मांग की है।

एनएफसीएसएफ ने विशेष रूप से शुगर डेवलपमेंट फंड (एसडीएफ) के तहत चल रही वन टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) योजना में व्यापक सुधार की आवश्यकता जताई है। फेडरेशन का कहना है कि मौजूदा योजना अपेक्षित परिणाम देने में विफल रही है।

इस संबंध में हर्षवर्धन पाटिल और प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में सहकारिता मंत्रालय के सचिव आशीष कुमार भूटानी से मुलाकात कर क्षेत्र की समस्याओं पर विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

फेडरेशन के अनुसार, सहकारी चीनी मिलें इस समय कई चुनौतियों से जूझ रही हैं। गन्ना खरीद लागत में वृद्धि, चीनी के कम बाजार मूल्य और किसानों को बकाया गन्ना भुगतान (केन एरियर) का बढ़ता बोझ, इन सभी कारणों से मिलों की नकदी स्थिति पर गंभीर असर पड़ा है। इसके चलते मिलों के लिए ऋण चुकाना और संचालन बनाए रखना कठिन हो गया है।

एनएफसीएसएफ ने यह भी बताया कि वर्तमान ओटीएस योजना में बकाया राशि पर अधिक ब्याज भार होने के कारण मिलों की भागीदारी सीमित रही है। योजना को प्रभावी बनाने के लिए फेडरेशन ने सामान्य ब्याज और दंडात्मक ब्याज में कम से कम 50 प्रतिशत की छूट देने का प्रस्ताव रखा है, जिससे मिलों को समझौता करने के लिए प्रोत्साहन मिल सके और वसूली दर में सुधार हो।

वित्तीय दबाव के बावजूद, फेडरेशन ने वर्ष 2025-26 के लिए देश में चीनी की आपूर्ति को संतुलित बताया है। अनुमान के अनुसार, इथेनॉल उत्पादन के लिए 28 लाख टन चीनी के डायवर्जन के बाद कुल उत्पादन लगभग 281 लाख टन रहने की संभावना है। 50 लाख टन के शुरुआती भंडार को जोड़कर कुल उपलब्धता 331 लाख टन आंकी गई है।

यह मात्रा देश की लगभग 280 लाख टन की घरेलू खपत और करीब 10 लाख टन निर्यात की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त मानी जा रही है। सीजन के अंत में 41 लाख टन का स्टॉक बचने का अनुमान है, जो 2016-17 के बाद सबसे कम होगा, लेकिन अभी भी प्रबंधनीय स्तर पर है।

हालांकि, उत्पादन लागत और बाजार मूल्य के बीच का अंतर क्षेत्र के लिए बड़ी चिंता बना हुआ है। वर्तमान में चीनी का औसत एक्स-मिल मूल्य लगभग 3,850 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि उत्पादन लागत करीब 4,100 रुपये प्रति क्विंटल आंकी गई है। प्रति क्विंटल लगभग 250 रुपये के इस अंतर से मिलों को लगातार घाटा हो रहा है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति और कमजोर हो रही है तथा किसानों को भुगतान में देरी हो रही है।

एनएफसीएसएफ ने जोर देकर कहा कि सहकारी चीनी मिलों की स्थिरता और किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए सरकार का समयबद्ध हस्तक्षेप बेहद आवश्यक है। फेडरेशन ने क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता और वित्तीय सुदृढ़ता के लिए नीति निर्माताओं के साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।

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