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एनसीसीएफ: चंद्रपाल ने प्रशासक को वापस लेने की अपील की

एनसीयूआई के अध्यक्ष डॉ चंद्रपाल सिंह यादव ने प्रशासक को संस्था से वापस लेने की सरकार से अपील की है और राष्ट्रीय उपभोक्ता की शीर्ष संस्था एनसीसीएफ के नव निर्वाचित बोर्ड के साथ ही संस्था को जारी रखने के लिये कहा है। पाठको को याद होगा कि सरकारी नोमनी विजय कुमार ने एनसीसीएफ की मौजूदा बोर्ड पर आरोप लगाए थे, जिसको मद्देनजर रखते हुये मंत्रालय ने एनसीसीएफ में प्रशासक की नियुक्ति की।

यह स्पष्ट रूप से बिल्कुल गलत है और ऐसा किया जाना देश के कानून को ठेंगा दिखाने जैसा प्रतीक होता है, चंद्रपाल ने भारतीय सहकारिता से बातचीत में कहा। यह पहली बार नहीं है की एनसीसीएफ सरकारी कुचक्र का शिकार हो रही हो, यादव ने कहा।

मैं सरकार से अपील करता हूं कि सरकार अपने निर्णय को जल्द से जल्द वापस ले और नव निर्वाचित बोर्ड को भय अथवा पक्षपात के बिना कार्य करने की अनुमति दे। हाल ही में निर्वाचित बोर्ड चुनाव के बाद से एक बार भी बैठक नहीं कर पाई है और अब और तो और सरकार ने अगली कार्रवाई तक बोर्ड को निलंबित कर दिया है, एनसीयूआई के अध्यक्ष ने आश्चर्य जनक भाव में कहा।

पाठको को याद होगा कि उपभोक्त मंत्री ने एम.के.परीदा को संस्था में प्रशासक के तौर पर नियुक्त किया है और विजय कुमार द्वारा मौजूदा बोर्ड पर लगाए गये आरोपों की जांच पड़ताल की रिपोर्ट तीन महीने के भीतर प्रस्तुत करने को कहा है।

गौरतलब है कि सरकार ने अतीत में जारी आदेश में कहा था कि एनसीसीएफ के पूर्व अध्यक्ष विरेन्द्र सिंह के पिछले कार्यकाल के दौरान वित्तीय अव्यवस्था और कुप्रबंधन जैसे गंभीर आरोपों को मद्देनजर रखते हुए सिंह के खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है। एनसीसीएफ में 6 फरवरी 2015 के चुनाव में निदेशकों को सीबीआई जांच के चलते विरेन्द्र सिंह को संस्था के उपाध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया गया और वहीं बहुराज्य सहकारी संघ के उपाध्यक्ष बिजेंद्र सिंह जिन पर नैफेड बोर्ड के डायरेक्टर के रूप में गबन की सीबीआई जांच पड़ताल चल रही है, उनको एनसीसीएफ के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया गया था।

चंद्र पाल का मानना है कि इस तरह के निर्णय सहकारी संस्थाओं कि उस मनोदशा के खिलाफ है, जो 97 सीएए के पारित सहकारी संस्थाओं के सशक्तिकरण से निकलती है। यह दुख की बात है कि नव निर्वाचित बोर्ड को निलंबित कर 97 संविधान संशोधन को अप्रभावी बना दिया गया है।

अगर सरकार हमारी बात नहीं सुनती है तो हमें मजबूरन कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा। ऐसी समस्या से छुटकारा पाने के लिए क्या विकल्प है, हमे बताओ, सहकारी संस्थाओं की शीर्ष संस्था के अध्यक्ष ने निराश स्वर में पूछा।

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