हमारे पास लड़ाई के अलावा कोई विकल्प नहीं: चंद्र पाल

एनसीयूआई से एनसीसीटी के विलय करने वाले पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए देश के शीर्ष सहकारी संस्था के नेता डॉ चंद्रपाल सिंह यादव ने कहा कि, "यह लड़ाई हमारी मजबूरी है; अब कोई विकल्प नहीं बचा है "।

एनसीयूआई के बनने के पीछे मुख्य लक्ष्य सहकारी समितियों और सहकारिता में लगे लोगों की प्रशिक्षण आवश्यकताओं को पूरा करना था। एनसीयूआई के अस्तित्व में आने का कारण यही था और अब जब एनसीसीटी को इससे दूर करने की बात हो रही है तो खतरा इसके अस्तित्व का है और हम इसकी रक्षा में कोई भी कदम-कानूनी या राजनैतिक- उठाने को तैयार है, चंदपाल ने कहा।

हमलोगों ने हमेशा मंत्रालय के साथ तालमेल मिलाकर चलने की कोशिश की है। आमतौर पर इसके हस्तक्षेप को हम सहते रहे हैं लेकिन यह तो चरम स्थिती है। यह तो सीधा सीधा शीर्ष सहकारी  संस्था पर प्रहार है, इसके अस्तित्व पर चोट है, यादव ने कहा। हम इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे, यादव ने इस मामले में कानूनी रास्ता अपनाने की ओर इशारा करते हुए कहा।

एनसीयूआई के बाईलाउ स्पष्ट हैं और इसमें साफ साफ लिखा है कि एनसीसीटी इसका हिस्सा है। सरकार एनसीसीटी को एनसीयूआई से मनमाने ढंग से डिलींक नहीं कर सकती है। एनसीयूआई हजारों लोगों का शीर्ष सहकारी निकाय है और एनसीसीटी के बारे में निर्णय इसके सदस्य ले सकते हैं न कि सरकार, यादव ने स्प्ट किया।

भारतीय सहकारिता को पता चला है कि एनसीयूआई ने इस मामले में वकीलों की सलाह ली है। कई वकील ने कहा है कि प्रथम दृष्टि में सरकार का पक्ष कमजोर है। कईयों ने तो मंत्रालय से जारी "गलत आदेश" के खिलाफ जल्द राहत दिलाने का आश्वासन भी दिया है।

एक स्रोत के मुताबिक, मंत्रालय का यह आदेश एमएससीएस एक्ट 2002 का उल्लंघन है, जिसे औरों पर लागू करने की प्रतिज्ञा मंत्रालय दिनरात लेता रहता है।

इसके अलावा, आरआईसीएम और आईसीएम का मुद्दा है जिन्हें संबंधित राज्यों के सहयोग से चलाया  जाता है। ऐसे कई राज्य संघ हैं जो केंद्रीय सरकार द्वारा नियंत्रित होने के विचार को पसंद नहीं करते हैं। संघ सरकार इस बवात कुछ भी नहीं कर सकती क्योंकि सहकारिता राज्य विषय है।

"हां यह सच है", चंद्र पाल ने इस बात पर मोहर लगाते हुए कहा। "यह एनसीयूआई ही है जिसने राज्यों और मंत्रालय के बीच अंतरफलक का काम करते हुए इन्हें बांधे रखने का काम किया है । इन राज्कीय  संगठनों के पास संबंधित राज्यों द्वारा दिए गए फंड और कार्यालय दोनों हैं – फिर वो क्यों किसी की बात सुने ", यादव ने रेखांकित किया।

"हालांकि ये सरकार का काम है और वो कई संगठनों को अनुदान देती रहती है, लेकिन अगर स्थिति खराब हो जाती है तो हम एनसीसीटी के लिए अनुदान लेने से मना भी कर सकते हैं। सहकारी आंदोलन की स्वतंत्रता सर्वोच्च मूल्य की है और इसे मंत्रालय के अधिकारियों की ताकत पर नहीं चलया जा सकता है ", यादव ने कहा।

भारतीय सहकारिता को यह भी पता चला है कि "एनसीसीटी फंडिंग" के मामले में 80% से अधिक फंड एनसीयूआई के माध्यम से पूरा किया जाता है और शेष 20% सरकारी अनुदान द्वारा।

एनसीसीटी के अलावा, एनसीयूआई की गतिविधियां में सहकारी शिक्षा (एनसीसीई), फील्ड प्रोजेक्ट्स और दुनियाभर में भारतीय सहकारिता के चेहरे को दुरूस्त रखना है। "यह देश के सहकारी आंदोलन का चेहरा है और इसे बाबुओं को सौंपना आंदोलन के लिए खुशखबरी नहीं है", सहकारी नेताओं ने लगभग एक स्वर  में कहा।

यहां तक कि आरएसएस प्रमुख ने हाल ही में एक सहकारी समारोह में कहा था कि सहकारिता तभी सफल होती है जब सरकार के प्रयासों को एक उत्साही नेतृत्व द्वारा निर्देशित किया जाता है। "सरकार कई सालों से सहकारी गतिविधियों चला रही है, लेकिन आपने कोई परिणाम देखा है ", उन्होंने पूछा। वर्तमान बीजेपी नेतृत्व आरएसएस प्रमुख को अपना मार्गदर्शक मानती है तो क्या वो उनकी बात पर गौङ नहीं फरमायेगी, उन्होंने पूछा।

इंडियन कोऑपरेटिव का भी मानना है कि सहकारी आंदोलन को बाबूओं के हाथ सौंपना एक घातक कदम सिद्ध होगा क्योंकि नौकरशाहों किसी के लिए जवाबदेह नहीं हैं। इसके बजाय, सरकार को सहकारी नेतृत्व को शुद्ध करने का प्रयास करनी चाहिए।

 

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