एनसीडीसी देश के सहकारी आंदोलन को चौपट कर रहा है

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) देश में एक सफल सहकारी आंदोलन के सपनें को साकार करने में मदद कर सकता है। लेकिन वह सिर्फ बहस और सेमिनार करने में व्यस्त रहता है।

संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 2012 को अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा करने के बाद हाल ही में एक सहकारी प्रबंधन संस्थान (एनसीयुआई के अंतर्गत की समिति) ने इम्फाल में एक समारोह का आयोजन किया।

सहकारिता और समाज कल्याण मंत्री ए के मीराबाई, एस के टकर, थाईलुंग पमैई और पी वाईफेई सहित कई महत्वपूर्ण लोगों ने उद्घाटन समारोह में भाग लिया।

इस अवसर पर मीराबाई ने अपने भाषण में सहकारी समितियों को  वित्तीय अनुसाशन विकसित करने की अपील की। मंत्री ने कहा कि एनसीडीसी की योजनाओं से सहकारी समितियाँ काफी लाभ उठा सकती है।

कई नेताओं ने सहकारी आंदोलन की ऊर्जा से गरीबी को हटाने का आह्वान किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि सहकारी आंदोलन समाज में व्याप्त असमानता को समाप्त करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारतीय सहकारी आंदोलन को फंड की कमी है। यदि एनसीडीसी ठीक से काम करें तो पूरे देश में सहकारी आंदोलन को सफलतापूर्वक फैलाया जा सकता है।

लेकिन एनसीडीसी में व्याप्त नौकरशाही के कारण परियोजनाएँ धूल खा रही हैं। लेकिन एनसीडीसी सेमिनार आयोजित करने का एक भी मौका गँवाना नहीं चाहता। हाल ही में चंडीगढ़ में इसके द्वारा एक अर्थहीन सेमिनार आयोजित किया गया।

एनसीडीसी का जनादेश काफी स्पष्ट है। सरकार के फंड से सहकारी उद्यमी को जरुरी मदद दे कर सफल बनाना है।

एनसीडीसी अपने काम में कितना प्रभावी है यह देश के किसी भी राज्य में चक्कर लगाने से स्पष्ट हो जाता है। देश का अधिकांश भाग कृषि में लगा हुआ है लेकिन तमाम औद्योगिक विकास की संभावनाएँ मौजूद है।

इसके बावजूद कुछ साहसी उद्यमी एनसीडीसी के सामने अपनी परियोजनाओं को रखते है लेकिन नौकरशाही कुछ भी होने नही देते है।

अंतर्राष्ट्रीय वर्ष में एनसीडीसी के प्रबंध निदेशक का साक्षात्कार लेने के लिए भारतीय सहकारिता डॉट कॉम के द्वारा भेजा गया पत्र अभी तक धूल खा रहा है। इससे साफ है कि यह संगठन किसी भी मामले में गंभीर नही है।

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